वानस्पतिक औषधियाँ

अश्वगन्धा ( विथेनिया सोमिनीफेरा )

डॉ अनुज कुमार सिंह सिकरवार

साभार सोशल मीडिया

यह सोलोनेसी कुल का एक वर्षीय शाकीय पौधा है, इसका वानस्पतिक नाम‘ क्लीओम विस्कोसा’ है,जो वर्षा ऋतु में यह पुष्पित और फलित होता है। इस पौधे में विशिष्ट गन्ध यानी अश्व(घोडे़)जैसी होती है, इसी करण इसे ‘अश्वगन्धा’के नाम से पुकारा जाता है। इसे जिनसिंग, गूजबेरी, विंटर चेरी के नाम से भी जाना जाता है।
यह उष्ण कटिबन्धीय जलवायु का पौधा है और जंगली अवस्था में प्राकृतिक रूप में उगता है।यह कच्चे-पक्के मार्ग, सड़कों के किनारे की खाली जमीन/ फुटपाथ पर आसानी से दिखायी दे जाता है।
इसके पौधे की ऊँचाई लगभग 1 मीटर तक होती है और पत्तियाँ 5 पालियों में बँटी होती है तथा रांेयेदार/रोमिल होती है। इसके पुष्प पीले रंग के होते हैं। पुंकेसर स्पष्ट और लम्बे होते हैं। इसके फल और फली की तरह लम्बे, सम्पुटिका युक्त होते हैं।

छाया – राष्ट्रवन्दना

औषधि उपयोग/ गुण- इसमें क्लीओमिन एवं विस्कोसिन एल्केलाइड पाये जाते हैं। इसकी पत्तियाँ खाने योग्य और पौष्टिक होती हैं। इनका स्वाद कड़वा/कसैला होता है, इसलिए दूसरी सब्जियों के साथ मिलाकर आहार में सम्मिलित की जा सकती हैं।
जुकाम में पत्तियों की भाप लेने से आराम मिलता या लाभ होता है। खाँसी-जुकाम में अश्वगन्धा की पत्तियों का काढ़ा बनाकर पीया जाता है। घाव और विषैले कीट के काटने पर पत्तियाँ पीसकर लगाई जाती हैं।

अश्वगन्धा के बीजों के काढ़े से बवासीर रोग में पाइल्स को धोने पर उनकी सूजन समाप्त हो जाती है। इसकी सब्जी गर्भवती महिलाओं के लिए एक पौष्टिक आहार के रूप में प्रयुक्त की जाती है।

About the author

Rekha Singh

1 Comment

Click here to post a comment

Live News

Advertisments

Advertisements

Advertisments

Our Visitors

0234008
This Month : 2306
This Year : 33511

Follow Me