राजनीति

फिर बेनकाब हुए फर्जी सेक्युलर

डाॅ.बचन सिंह सिकरवार

गत दिनों दिल्ली की साकेत अदालत ने ‘बाटला हाउस काण्ड’ में दिल्ली समेत जयपुर, अहमदाबाद आदि में हुए सीरियल बम विस्फोटों में मामले में बम बनाने में माहिर ‘इण्डियन मुजाहिदीन’ के आतंकवादी आरिज खान को स्पेशल सेल के पुलिस इन्स्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा की हत्या का दोषी और इस मुठभेड़ को भी सही मानते हुए जो निर्णय दिया है, उसने अपने देश की राजनीति और कथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के स्वार्थी और घिनौने चेहरों को एक बार फिर से बेनकाब कर दिया है, जिन्हंे सत्ता हासिल करने को मुल्क के दुश्मनों की हिमायत लेने और उन्हें बचाने से भी कतई गुरेज नहीं है। अब सवाल यह है कि ‘बाटला हाउस मुठभेड’़ के सही साबित होने पर क्या सेक्युलर सियासी पार्टियों के वे नेता देश की जनता और उस मुठभेड़ में शहीद हुए पुलिस इन्स्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा के परिजनों से माफी माँगेंगे, जो इसे फर्जी बताकर लोगों को गुमराह और पुलिस को बदनाम कर रहे थे ?‘इसकी वजह से मुसलमानों के एकमुश्त वोट पाने की चाहत थी और इसमें एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ थी। तब मुसलमान मतदाताओं के एक मुश्त वोटों की तलबगार कथित सेक्युलर सियासी पार्टियों ने ‘बाटला हाउस’ की मुठभेड़ को फर्जी करार देते हुए इन दहशतगर्दों को बेकसूर और पुलिस को गुनाहगार ठहराया था। इनमें खुद को धर्मनिरपेक्षता की झण्डाबरदर साबित करने .वाली काँग्रेस, तृणमूल काँग्रेस, आप, सपा, बसपा, एआइएमआइएम,वामपन्थी पार्टियाँ सबसे आगे थीं। वह भी तब जब केन्द्र में काँग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग गठबन्धन की सरकार थी और गृहमंत्री पी.चिदम्बर ने इस मुठभेड़ को सही बताया था। फिर भी काँग्रेस के दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद जैसे वरिष्ठ नेता उनके कहे पर ऐतबार करने को तैयार नहीं थे। उस समय देश में भाजपा ने न सिर्फ ‘बाटला हाउस की मुठभेड़’ को सही माना,बल्कि शहीद मोहन चन्द शर्मा को शहीद का दर्जा दिये जाने की माँग की थी।
वैसे भी इनकी किसी भी सियासी पार्टी के धर्म निरपेक्ष यानी सेक्युलर और साम्प्रदायिक या फिर जातिवादी होने की कसौटी/परिभाषा भी सत्ता समीकरण के हिसाब से बदलती रहती है। यही कारण है कि इनके लिए केरल में ‘इण्डियन यूनियन मुस्लिम लीग’,ईसाइयों की पार्टी ‘केरल काँग्रेस’, हैदराबाद में असदुद्दीन ओवैसी की ‘आॅल इण्डिया मजलिए-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन’(ए.आइ.एम.आइ.एम.) और अब पश्चिम बंगाल के हुगली स्थित फुरफुरा शरीफ दरगाह के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की ‘इण्डियन सेक्युलर फ्रण्ट’(आइ.एस.एफ.) सेक्युलर हैं। इसी तरह कश्मीर की पी.डी.पी.,नेशनल काॅन्फ्रेंस,पीपुल्स काॅन्फ्रेंस, पंजाब की ‘शिरोमणि अकाली दल’(शिअद),असम में बदरुद्दीन अजमल की ‘आॅल इण्डिया युनाइटेड फ्रण्ट’(ए.आइ.यू.डी.एफ.) भी सेक्युलर हैं। ऐसे ही कुछ विशुद्ध जाति/सम्प्रदाय की सियासत करने वाली सपा,बसपा,राजद आदि भी उनकी निगाह में इसी श्रेणी में आती हैं।
13 सितम्बर, 2008 को दिल्ली के जामिया मिलिया नगर स्थित ‘बाटला हाउस’ में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को यह सूचना मिली थी कि यहाँ सीरियल बम ब्लास्ट के आरोपित मौजूद हैं। जब वह सादा वर्दी में पहुँची,तब उन्होंने उस पर गोलीबारी शुरू कर दी। इसमें दो दहशतगर्द मारे गए तथा एक मौके पर गिरपतार कर लिया गया। आरिज खान फरार हो गया। इस मुठभेड़ में दो पुलिस कर्मी बुरी तरह से घायल हुए। इन्स्पेक्टर मोहनचन्द्र शर्मा को कई गोलियाँ लगी थीं,जो अधिक खून बह जाने से इलाज के दौरान शहीद हो गए। मोैके पर गिरपतार शाहजाद अहमद उर्फ पप्पू को उनकी हत्या को दोषी करार दिया जा चुका है। तब इस मुठभेड़ ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया था। इस मुद्दे को कथित सेक्युलर सियासी पार्टियों ने पहले सन् 2009 के लोकसभा और बाद में 2012 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा में बेशर्मी से भुनाने की भरसक कोशिश की थी।
चूँकि मारे गए दहशतगर्द आजमगढ़ के रहने वाले थे। इसलिए सन् 2012में उत्तर प्रदेश के विधानसभा के चुनाव प्रचार के दौरान यहाँ आयोजित एक सभा में काँग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने कहा था कि इस मुठभेड़ में मारे गए लड़कों की तस्वीरें जब तत्कालीन काँग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने देखीं,तो उनके आँसू फूट पड़े और उन्होंने प्रधानमंत्री के पास जाने को कहा। काँग्रेस के दूसरे नेता दिग्विजय सिंह ने इस मुठभेड़ को फर्जी बता दिया और लगातार अपनी बात पर अडिग रहे। यहाँ तक कि दिग्वियज सिंह ने तो काँग्रेस नेताओं के एक प्रतिनिधिमण्डल के साथ घटना में मारे गए लोगों के परिजनों से मुलाकात भी की थी। आम आदमी पार्टी(आप)के नेता अरविन्द केजरीवाल ने तो उन्हें गोली मारने के बजाय जीवित पकड़ने की बात कही और पुलिस की निन्दा की थी। तृणमूल काँग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने बाटला हाउस मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए उसकी न्यायिक जाँच की माँग की थी। इस घटना के सही होने पर राजनीति छोड़ने देने की बात भी कही थी। सपा और बसपा ने भी दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए न्यायिक जाँच की माँग की थी। यहाँ तक कि देश के कुछ समाचार पत्रों ने भी इसे फर्जी मुठभेड़ साबित करने की कोशिश की। इससे व्यथित होकर सन् 1984के बैच के आइ.पी.एस.और दिल्ली पुलिस की स्पेशल शाखा के तत्कालीन प्रमुख करनैल सिंह ने ‘बाटला हाउसः एन एनकाउण्टर दैट शूक द नेशन’ शीर्षक से एक पुस्तक लिखी।इसमें उन्होंने खुलासा किया है कि किस प्रकार फर्जी खबरों और भ्रामक बातों द्वारा इस मुठभेड़ को फर्जी साबित किया जा रहा था। इस मुठभेड़ को फर्जी करार देने वाले तमाम आरोपों को तथ्यों और तर्कों से खण्डन किया गया। इसमें यह भी लिखा है कि 2008में दिल्ली धमाकों के सिलसिले में छानबीन के दौरान स्पेशल को बाटला हाउस में आतंकवादियों के छुपे होने का पता चला था,जिनमें 39लोग मारे गए थे।
अब चर्चा करते हैं पश्चिम बंगाल में पीरजादा अब्बास सिद्दीकी द्वारा हाल में गठित तथाकथित सेक्युलर सियासी पार्टी आइ.एस.एफ.की,जो मुसलमानों,दलितों,आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ने की बात कर रही है। इसके साथ वामपन्थी पार्टियों ने विधानसभा के चुनाव के लिए गठबन्धन किया है। इसमें काँग्रेस भी सम्मिलित है। इस पर वरिष्ठ काँग्रेस नेता आनन्द शर्मा ने आपत्ति व्यक्त की, तो उन पर लोकसभा में काँग्रेस दल के नेता अधीर रंजन चैधरी चढ़ बैठे। उन्होंने काँग्रेस को उनकी पार्टी से दूर रहने की सलाह बेवजह नहीं थी। दरअसल नए-नए सेक्युलर नेता बने पीरजादा अब्बास सिद्दीकी पहले तृणमूल काँग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी के खासमखास थे, पर उनके जरिए राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा पूरी न होने पर खुद की पार्टी बना ली। इनसे पहले हैदराबादी भाईजान ओवैसी ने उनके साथ सियासी गठबन्धन बनाना चाहा,लेकिन बात नहीं बनी। पीरजादा खुद को सेक्युलर भले ही बताएँ, पर असल मेें वह घोर इस्लामिक कट्टरपंथी और शरिया कानून के हामी हैं।इसका सुबूत यह है कि जब तृणमूल काँग्रेस की सांसद नुसरत जहाँ जब एक कार्यक्रम में मन्दिर गईं,तब पीरजादा ने उन्हें न सिर्फ काफिर और कौम का गद्दार बताया, बल्कि बेहया बताते हुए पेड़ से बाँध कर पीटने को कहा था।इसी तरह कोलकाता के मेयर फरहाद हाकिम के शिवरात्र पर किसी मन्दिर जाने पर उन्हें कौम गद्दार करार दिया था। यहाँ तक कि फ्रान्स के शिक्षक सैम्युल पैटी के मुस्लिम छात्र द्वारा किये कत्ल को जायज ठहराया था। इतना ही नहीं, कोरोना काल में सिद्दीकी का यह कहते हुए विडियो वाइरल हुआ था। उसमें वे कह रहे थे कि अल्लाह कोई ऐसा वायरस भेजे जिससे हिन्दुस्तान में 10-20-50करोड़ लोग मारे जाएँ। अब इस वीडियों को वह अपने सियासी दुश्मनों की साजिश बता रहे हैं। हैदराबाद में असदुद्््दीन ओवैसी की पार्टी ‘आॅल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुिस्लमीन’ है,जिसमें मुस्लिम शब्द जुड़ा है।फिर भी कथित सेक्युलर सियासी पार्टियाँ और कुछ समाचार पत्र भाजपा को साम्प्रदायिक उसे सेक्युलर मानते हैं। हैदराबाद में काँग्रेस इसके साथ सियासत कर चुकी है, पर 2012में उसके द्वारा उसने चारमीनार के पास मन्दिर की जीर्णोद्धार कराये जाने से खफा होकर भाईजान से उसका साथ छोड़ दिया । अब असम काँग्रेस असम में बदरुद्दीन अजमल की ‘आॅल इण्डिया युनाइटेड फ्रण्ट’(ए.आइ.यू.डी.एफ.) के चुनाव लड़ रही है,जो पूरी तरह कट्टरपन्थी इस्लामिक पार्टी है।
केरल में ‘इण्डियन यूनियन मुस्लिम लीग ‘ काँग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे(यूडीएफ)की एक घटक है, जो देश के विभाजन के जिम्मेदार जिन्ना की ‘आॅल इण्डिया मुस्लिम लीग’का अवशेष । इसकी और ईसाइयों की पार्टी केरल काँग्रेस की मदद से ही राहुल गाँधी वायनाड से लोकसभा चुनाव जीत पाये हैं। विडम्बना यह है कि केरल में वामपंथी पार्टियाँ इसे साम्प्रदायिक पार्टी मानती हैं, पर तमिलनाडु में ये ही वामपंथी दल काँग्रेस, मुस्लिम लीग से मिलकर चुनाव लड़ते हैं।केरल में काँग्रेस और वामपंथी परस्पर विरोधी हैं, पर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में साथ-साथ हैं। कश्मीर में नेका,पीडीपी,पीके आदि स्थानीय दलों को मकसद इस सूबे को दारुल इस्लाम बनाना है।फिर भी काँग्रेस और भाजपा इनके साथ सरकार बनाने में कोई परहेज नहीं है। वस्तुतः अपने देश में राजनीतिक पार्टियों ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए सेक्युलरिज्म या धर्मनिरपेक्षता को लोगों को भ्रमित/गुमराह करने को औजार बनाया हुआ है। वैसे भी पंथनिरपेक्षता देश की सनातन संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है, जिसमें हर पंथ को समान महत्त्व और सम्मान प्राप्त है।ऐसे में देश में सेक्युरिज्म/धर्मनिरपेक्षता शब्द ही निरर्थक हंै।
सम्पर्क-डाॅ.बचन सिंह सिकरवार 63ब,गाँधी नगर,आगरा-282003मो.नम्बर-9411684054

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