देश-दुनिया

तब ही हो पाएगी है ताइवान की सुरक्षा

डॉ.बचन सिंह सिकरवार

साभार सोशल मीडिया

गत दिनों में ताइवान की राष्ट्रपति सई. इंग-वेन अपने सुरक्षा अधिकारियों और पश्चिम राजनयिकों से दक्षिण चीन सागर तथा ताइवान की खाड़ी में चीन के रवैये की इशारा करते हुए इसे क्षेत्रीय स्थिरता को जो खतरा बताया है, उसमें न तो कुछ गलत है और न ही उस पर सन्देह की कोई गुजांइश ही है। जिस तरह चीन भारत के लद्दाख और दूसरे इलाकों के साथ-साथ दक्षिण चीन सागर में न सिर्फ आक्रामक तेवर दिखा रहा है,बल्कि उन कब्जा करने की कोशिश कर रहा है उसे देखते हुए ताइवान की राष्ट्रपति वेन की आशंका अत्यन्त सामयिक है। उसका सामना और निपटने के अपेक्षित सर्तकता-सावधानी तथा सैन्य तैयारी आवश्यक है। उनकी यह आशंका भी सही है कि इस कारण हिन्द-प्रशान्त क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है,क्यों कि इसी सामुद्रिक मार्ग कई देशों को व्यापार होता है। इसलिए ऐसी नौबत आने से पहले ही चीन के सम्भावित हमला का प्रभावी मुकाबला करने की तैयारी करना जरूरी है।
राष्ट्रपति साई इंग वेन का यह आह्वान भी सर्वथा उचित है कि चीन के खिलाफ लोकतांत्रिक देशों को एक साथ आना चाहिए। उनके इस बयान से निश्चय ही चीन को बहुत बुरा लगा होगा,क्यों कि वह जिस ताइवान को दुनियाभर में अपने देश का एक हिस्सा बताता है,वही उसके खिलाफ लोकतंात्रिक देशों को एकजुट होने का आह्नान कर रहा है। चीन ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानता है। इसीलिए चीन उन्हें किसी भी सूरत में चुनाव न जीतने देने के लिए हर सम्भव कोशिश की,किन्तु उनकी स्पष्टवादिता और निडरता को देखते हुए जनता ने फिर से चुनाव में जिताया और चीन हाथ मलता रह गया। यही कारण है कि राष्ट्रपति सईं इंग वेन एक फिर चीन की प्रतिक्रिया परवाह किये बगैर यह कहना जरूरी समझा है कि अधिनायकवादी आक्रामता से लोकतंत्र की रक्षा के लिए ताइवान सबसे आगे खड़ा है। उन्होेंने कहा कि इस समय समान सोच वाले लोकतांत्रिक और मित्र देशों को मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाना चाहिए,जो एकतरफा आक्रामक कार्रवाइयों पर अंकुश लगा सके। ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग वेन ने चीन के खिलाफ लोकतांत्रिक देश को संगठित होने को अवश्य कहा है,पर उनके ऐसा कहने के ये माने नहीं है कि वे चीन से युद्ध करना चाहती हैं। दरअसल,वे अपनी विचारधारा के देशों को हमलावार चीन से केवल सुरक्षा चाहती है। इसीलिए उन्होंने आगे यह कहना भी जरूरी समझा कि सभी देशों को एक ऐसी रणनीति बनाने की जरूरत है जिससे सम्भावित युद्ध को टाला जा सके और लोकतंत्र की रक्षा की जा सके। वस्तुतः चीन जिस ताइवान को अपना इलाका बता रहे है, वह कानून उसका नहीं है।यह कैसे इसके लिए ताइवान के इतिहास जानना जरूरी है। वैसे जिस चीन पर वर्तमान में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन है,उस पर भी ताइवान के राष्ट्रपति चांग काई शेक का शासन था,जिस पर कम्युनिस्टों से बन्दूक के जोर पर कब्जा किया हुआ है।

साभार सोशल मीडिया

अब लोकतांत्रिक ताइवान को चीन अपना हिस्सा मानता है। चीन ने पूर्वी और दक्षिण चीन सागर की तरह ताइवान के इर्द-गिर्द भी अपनी सैन्य गतिविधियों बढ़ा रखी है। ताइवान चीन के पूर्व एशिया में स्थित एक द्वीप है। यह द्वीप अपने आसपास के कई द्वीपों को मिलाकर चीन गणराज्य का अंग है जिसका मुख्यालय ताइवान द्वीप में है। ताइवान का क्षेत्रफल 36,193किलोमीटर है और राजधानी ताइपे है। यह नगर देश के उत्तरी भाग में स्थित है, जो इस देश का वित्तीय केन्द्र भी है । इसकी जनसंख्या- ढाई करोड़ से अधिक है जो बौद्ध, तोवायिसम, कन्फूसियस धर्म मानते है और अधिकारिक मन्दारिन भाषा बोलते हैं। ताइवान की मुद्रा-नया ताइवान डॉलर है। ताइवान के निवासी मूलतः चीन के पयूकियन और क्वांगतुम प्रदेशों से आकर बसे लोगों के वंशज हैं। इनमें ताइवानी उन्हें कहा जाता है, जो यहाँ द्वितीय युद्ध होने के पहले से बसे हुए हैं। ये ताइवानी लोग दक्षिण चीनी भाषाएँ अमाय, स्वातीय , हक्का बोलते हैं। इस इलाके पर 50 साल के जापान शासनकाल काफी लोगों ने जापानी भी सीख ली थी। आदिवासी मलय, पालीनेशियाई समूह की बोलियाँ बोलते हैं। चीन के प्राचीन इतिहास में ताइवान का उल्लेख संक्षिप्त में उपलब्ध है। फिर भी जो भी प्रमाणों मिले हैं, उनसे ज्ञात होता है कि तांग राजवंश (618-907)के समय में चीनी लोग मुख्य भूमि से निकलकर ताइवान में बसने लगे थे। फिर कुबलई खाँ के शासन काल (1263-94) में निकट के पेस्काडोर्स द्वीपों पर नागरिक प्रशासन की पद्धति शुरुआत हुई। तब तक ताइवान पर मंगोलों का आगमन नहीं हुआ था।
जिस काल में चीन में सत्ता मिंग वंश(1368- 1644ई.) के हाथ में थीं, तब कुछ जापानी जलदस्युओं तथा निर्वासित और शरणार्थी चीनियों ने ताइवान के तटीय प्रदेशों पर वहाँ के आदिवासियों को हटाकर बलात् अधिकार कर लिया। चीनी दक्षिण-पश्चिम और जापानी उत्तरी इलाकों में बस गए।
तदोपरान्त सन्1517 में ताइवान में पुर्तगाली पहुँचे और उसका नाम ‘इला फारमोसा’ रखा। सन् 1622 में व्यापारिक प्रतिस्पर्द्धा से प्रेरित होकर डचों(नीदरलैण्ड)ने पेस्काडोर्स पर अधिकार कर लिया। दो साल बाद चीनियों ने डच लोगों से संधि कर ली।,उसके अनुसार डचों ने उन द्वीपों से हटकर अपना व्यापार केन्द्र ताइवान बनाया। ताइवान के लिए दक्षिण-पश्चिम भाग में फोर्ट जीलांडिया और फोर्ट प्राविडेंशिया दो स्थान निर्मित किये। कालान्तर में धीरे-धीरे राजनीतिक दाँव-पेचों से उन्होंने सम्पूर्ण द्वीप पर अपना अधिपात्य जमा लिया।
इसके बाद सत्रहवीं शताब्दी में चीन में मिंग वंश का पतन हुआ। मांचू लोगों ने चिंग वंश(1944-1912ईस्वी) की स्थापना की। सत्ताच्युत मिंग वंशीय चेंग चेंग कुंग ने सन् 1661-62 में डचों को खदेड़ कर ताइवान में अपना राज्य स्थापित किया। सन् 1682 में मांचुओं ने चेंग चेंग कुंग के उत्तराधिकारियों से ताइवान भी छीन लिया। सन् 1883 से 1886 तक ताइवान पयूकियन प्रदेश के प्रशासन में था। सन् 1886 में उसे एक प्रदेश के रूप में मान्यता मिल गई। प्रशासन की ओर भी चीनी सरकार अधिक ध्यान देने लगी।
तत्पश्चात् सन् 1895 में ‘चीन-जापान युद्ध’ के बाद ताइवान पर जापान का झण्डा गड़ गया? लेकिन इस के द्वीपवासियों ने अपने को जापानियों द्वारा शासित नहीं माना। वे लगातार ताइवान गणराज्य के लिए संघर्ष करते रहे। द्वितीय विश्व युद्ध के ददौरान जापान ने वहाँ अपने प्रसार के लिए औद्योगीकरण की योजनाएँ शुरू कीं। इनका युद्ध की विभीषिका ने बहुत य समाप्त कर दिया। पहले काहिरा (1946)में उसके बाद पोट्सडम (1947)की घोषणाओं के अनुसार सितम्बर, सन् 1945 में ताइवान पर चीन का अधिकार फिर से मान लिया गया। लेकिन चीनी अधिकारियों के दुर्व्यवहारों से द्वीपवासियों में व्यापक क्षोभ उत्पन्न हुआ। विद्रोह का दमन बड़ी नृशंसता से किया गया। जनहित के लिए कुछ प्रशासनिक सुधार अवश्य लागू हुए।
फिर सन् 1911में कॉमिगतांग ने चीन देश के नाम ‘ रिपब्लिक ऑफ चाइना’ कर दिया, जो सन् 1950 तक रहा। सन् 1959 में कॉमिगतांग ने ताइवान में सरकार बनायी। इधर चीन में साम्यवादी आन्दोलन सफल हो रहा था। आखिर में च्यांग काई शेक तत्कालीन राष्ट्रपति को अपने नेशलिस्ट सेनाओं के साथ पलायन कर ताइवान आने को विवश होना पड़ा। इस प्रकार 8 दिसम्बर, सन् 1949 को चीन की नेशनलिस्ट सरकार का स्थानान्तरण हुआ। सन् 1950 में चांग काई शेक ने ताइवान का ‘नेशनलिस्ट रिपब्लिक ऑफ चाइना’ का मुख्यालय बनाया। सन् 1959 की सैनफ्रान्सिस्को सन्धि के अन्तर्गत जापान ने ताइवान से अपने सारे स्वत्वों की समाप्ति की घोषणा कर दी।
दूसरे ही वर्ष ताइपे में चीन-जापान सन्धि वार्त्ता हुई, पर किसी सन्धि में ताइवान पर चीन के नियंत्रण का स्पष्ट संकेत नहीं किया गया।
विगत अनेक वर्षों से चीन ताइवान पर कब्जे करने का षड्यंत्र करता आया है, लेकिन अब तक वह नाकाम रहा है। कुछ माह पहले चीन ने ताइवान से कहा कि यदि ताइवान को स्वतंत्र देश बनाने से रोकने के लिए चीन के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा,तो वह ताइवान पर हमला करेगा। लेकिन ताइवान ने डरने के बजाय इस धमकी पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। इस तरह कोरोना काल में चीन ने ताइवान पर हमले की धमकी दी थी। इस धमकी के काम को चीनी सेना के चीफ ऑफ ज्वाइण्ट स्टाफ डिपार्टमेण्ट और केन्द्रीय सैन्य आयोग के सदस्य ली जुआचेंग ने अंजाम दिया। उसने ताइवान के लिए बयान जारी करके उसे सन्देश दिया है कि यदि चीन को लगता है कि ताइवान को चीन में मिलाने में शान्तिपूर्ण प्रयत्न विफल हो गए हैं,तो वह ऐसी किसी भी अलगाव के षड्यंत्र को असफल करने के लिए हर कदम उठायेगा। चाहे उसे इसके लिए ताइवान पर हमला ही क्यों न करना पड़े। चीन ताइवान के लोगों के राष्ट्रप्रेम से भलीभाँति परिचित है। इसलिए उसे उम्मीद थी कि उसकी हमले की धमकी कारगर नहीं होगी। ऐसा ही हुआ । उसके हमले की बयान पर ताइवान के चीन मामलों के परिषद् ने कहा कि ताइवानी नागरिकों के लिए तानाशाही और हिंसा सदा ही अस्वीकार्य है। ताइवान का मानना है कि समस्याओं के समाधान का तरीका हिंसा और एकतरफा निर्णय द्वारा नहीं हो सकता।
ताइवान के इतिहास के अध्ययन यह निष्कर्ष निकलता है कि ताइवान उसके मुख्य-भूभाग का हिस्सा कभी नहीं रहा।ताइवान उसके कुछ शासकों का ही नहीं पुर्तगाल, नीदरलैण्ड, जापान का उपनिवेश रहा है। ताइपे में चीन-जापान सन्धि वार्त्ता हुई, पर उस सन्धि में ताइवान पर चीन के नियंत्रण का स्पष्ट संकेत नहीं है। फिर ताइवान पर तत्कालीन चीन के राष्ट्रपति चांग काई शेक का अधिकार है,जिसे चीनी कम्युनिस्ट अपना शत्रु मानते हैं,वे उनकी विरासत के हकदार किस कानून से हैं?
अब अमेरिका के विदेशमंत्री माइक पोम्पियों ने भी आसियान(दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों के संगठन) के वार्षिक सम्मेलन के दौरान अपने समकक्षों से चीन की दादागिरी के खिलाफ सभी सदस्य देशों को लामबन्द होने का आह्वान किये जाने से स्पष्ट है कि अमेरिका हर उस देश के साथ खड़ा है,जिसे चीन परेशान कर रहा है।
किया है। इस संगठन के चार देश वियतनाम, फिलीपीन्स, मलेशिया, बु्रनेई चीन साथ लम्बे समय से दक्षिण चीन सागर के व्यस्ततम मार्ग को लेकर क्षेत्रीय संघर्ष में उलझे हुए हैं, जिसके पूरे हिस्से पर चीन अपना होने का दावा कर रहा है और कृत्रिम द्वीप बनाकर सैन्य अड्डे बना रहा है। अमेरिका ने इस मामले में उनका साथ देने का वादा किया है। चीन भले ही पूरे दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा ठोक रहा है, लेकिन हकीकत में इस पर ताइवान,वियतनाम, मलेशिया,फिलीपीन्स, ब्रेनई, थाइलैण्ड, इण्डोनेशिया आदि हिस्सेदार हैे। चीन के इस रवैये के कारण ही अब अमेरिका, भारत, जापान, आस्टेªेलिया ने मिलकर ‘क्वाड’ बनाया हुआ है,इससे इस इलाके दूसरे देशों को जोड़ने के प्रयास जारी हैं ताकि चीन की आक्रामतता का मिलकर सामना किया जा सके। अब जहाँ तक वर्तमान में चीन द्वारा ताइवान का धमकाने की बात है तो वह सच है। चीन उसके आसपास अपने हवाई और विमानवाहक जलपोतों को भेज कर उसे भयभीत करने में जुटा है। इसी कारण अमेरिका ने भी अपने दो जंगी विमान वाहक जलपोत तैनात किये हुए है। फिर भी चीन अपने हमलावर हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। ऐसे में ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग वेन के कहे अनुसार लोकतांत्रिक देशों को एक सैन्य रणनीति बनाकर चीन के सम्भावित हमले के मुकाबले के लिए अपनी सेनाओं को तैयार रखना होगा,ताकि ताइवान और वे सुरक्षित रह सकें।
सम्पर्क-डॉ.बचन सिंह सिकरवार 63 ब,गाँधी नगर, आगरा- 282003 मो.नम्बर-9411684054

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