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मैनपुरी की अमर विभूति : स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी

12 अप्रैल (जन्म-दिवस) पर विशेष

डॉ. गोपाल चतुर्वेदी
एडवोकेट/वरिष्ठ पत्रकार

मैनपुरी की अमर विभूति स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी न केवल मैनपुरी के अपितु अपने समूचे देश के गौरव थे।उनका जन्म 12 अप्रैल सन् 1900 को मैनपुरी जनपद की करहल तहसील के ग्राम चंदीकरा में उस प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में हुआ था,जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महती भूमिका निभाई है।उनके पिता का नाम स्व. पण्डित गहवर सिंह था।उनके अग्रज स्व. पण्डित सिद्धगोपाल चतुर्वेदी “मैनपुरी षड्यंत्र केस” के प्रमुख अभियुक्त रहे थे।उनके सबसे बड़े भाई स्व. पण्डित दीनदयाल चतुर्वेदी ने अपने जीवन का उत्तरार्ध संन्यास ग्रहण कर स्वामी देवानंद सरस्वती के नाम से काशी एवं प्रयागराज में बिताया था। स्यात, अपने परिवार की गौरवशाली परंपराएं उन्हें विरासत में मिली थीं।
स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी की प्रारंभिक शिक्षा चंदीकरा(मैनपुरी) में एवं बाद की शिक्षा मैनपुरी, आगरा व इलाहाबाद में बी.ए. , एल-एल.बी. तक हुई।उन्होंने हिन्दी साहित्य सम्मेलन की “विशारद” परीक्षा भी ससम्मान उत्तीर्ण की थी। हिन्दी,अंग्रेजी एवं उर्दू आदि भाषाओं पर उनका असाधारण अधिकार था। हिन्दी से उन्हें विशेष प्रेम था। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय की हिन्दी परिषद् के मंत्री भी रहे थे।उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राष्ट्रभाषा हिन्दी के उन्नयन हेतु जो अनेकानेक कार्य किए,उनसे प्रभावित होकर वहां के तत्कालीन कुलपति डॉ. गंगानाथ झा ने उन्हें पुरस्कृत भी किया था।विद्या अध्ययन के दौरान उनका विवाह नगला पैज (फिरोजाबाद की शिकोहाबाद तहसील) निवासी स्व. पण्डित शोभाराम की सुपुत्री गंगादेवी के साथ हो गया था।
सन् 1925 में स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी ने मैनपुरी में स्व. बाबू धर्म नारायण,वकील के निर्देशन में वकालत प्रारंभ की। वे बहुत ही कम समय में माल व फौजदारी के प्रमुख वकीलों में गिने जाने लगे।वह कई वर्षों तक भारतीय रेलवे, मैनपुरी की नगर पालिका एवं मैनपुरी व सुजरई आदि रियासतों के कानूनी सलाहकार रहे।कालांतर में वह वकील सरकार के पद पर भी जा पहुंचे।उन्होंने वकालत के व्यवसाय में हमेशा अर्थ की जगह न्याय का पोषण किया।गलत एवं झूठे मुकदमों की पैरवी तो वह करते ही नहीं थे।
स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी सन् 1935 में कांग्रेस के सदस्य बने और आजीवन बने रहे।वह प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के भी सदस्य थे।सेवा समिति,मैनपुरी के द्वारा उन्होंने समाजसेवा के अनेकों कार्य किए।वह मैनपुरी स्काउट सभा के अध्यक्ष व हिंदुस्तान स्काउट एसोसिएशन के कमिश्नर दीर्घ काल तक रहे।कई वर्षों तक वे सिविल बार एसोसिएशन एवं जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे।साथ ही वे उत्तर प्रदेश सहकारी संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष कई वर्षों तक रहे।वह प्रादेशिक सहकारिता संघ के वरिष्ठ व कर्मठ अधिकारियों में गिने जाते थे।क्योंकि सहकारिता आंदोलन की बुनियाद रखने में उनका महत्वपूर्ण स्थान था। वे नेशनल कोऑपरेटिव यूनियन ऑफ इंडिया की एक्जीक्यूटिव कमेटी में कई वर्षों तक पदस्थ रहे।जिला सहकारी बैंक, मैनपुरी के वह लगभग 10 वर्षों तक मैनेजिंग डायरेक्टर रहे।वे मैनपुरी की जिला परिषद् के सन् 1936 में चेयरमैन चुने गए थे।इस पद पर उन्होंने 30 अप्रैल सन् 1948 तक निरन्तर 12 वर्षों तक कार्य किया। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आर्थिक सहायता आदि देकर अपना हर सम्भव योगदान दिया था।
स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी ने भयंकर गुलामी के काल में भी राष्ट्र भाषा हिन्दी के लिए जो महत्वपूर्ण कार्य किए थे,उन्हें राष्ट्र भाषा हिन्दी का इतिहास कभी भी नहीं भुला पाएगा। वे लम्बे अर्से तक हिन्दी साहित्य सम्मेलन एवं अखिल भारतीय ब्रज साहित्य मण्डल के प्रधानमंत्री रहे। उनके ही अथक प्रयासों से महाकवि देव की जन्म स्थली कुसमरा (मैनपुरी) में महाकवि देव स्मारक की स्थापना हुई थी।उन्होंने ही सुजरई की रानी के इकलौते पुत्र स्व. लाल सूरज भान सिंह के साहित्य प्रेम को दृष्टिगत रखते हुए मैनपुरी के लेनगंज पार्क में लाल सूरज भान सिंह पुस्तकालय की स्थापना कराई।जिसके कि वो आजीवन मंत्री रहे। वे आगरा कॉलेज,आगरा के लगभग 15 वर्षों तक ट्रस्टी रहे।ब्रिटिश काल में वह एजुकेशन वेलफेयर सोसाइटी से भी कई वर्षों तक संबद्ध रहे।उन्होंने ग्राम सुधार संघ, मैनपुरी के द्वारा विभिन्न ग्रामीण अंचलों में समाजसेवा के अनेकानेक कार्य किए। उत्तर प्रदेश की कई शिक्षण व समाजसेवी संस्थाएं उनके ही संरक्षण में पल्लवित हुईं। 27 मार्च सन् 1960 को उन्होंने “वकील सरकार” के पद से त्यागपत्र देकर एम.एल.ए. व एम.एल.सी. के चुनाव लड़े थे।जिनमें कि वे विभिन्न कारणों से सफल नहीं हो सके।प्रादेशिक सहकारिता संघ की ओर से उनको जून 1963 में इंटरनेशनल कोऑपरेटिव डेलीगेशन के अन्तर्गत इंटरनेशनल कोऑपरेटिव सेमिनार के लिए वारसा (पोलैंड) भेजा गया था। वहां से लौटने पर उनकी नियुक्ति केन्द्र सरकार में एक बहुत बड़े पद पर होने वाली थी, किन्तु दैव दुर्विपाक से 12 अगस्त सन् 1963 (श्रीकृष्ण जन्माष्टमी) को उनका आकस्मिक निधन हो गया।
स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी का व्यक्तित्व निर्झरयुक्त भूधर की संज्ञा से उपमित किया जा सकता था।उनका ललाट उन्नत था, दृष्टि विशुद्ध थी, मुख मंडल पर तेज था, वाणी में ओज था, भाव प्रेषणीयता थी। सहृदयता, सौजन्यता, स्वाभिमान और निर्भीकता आदि उनके हृदय में गहरी नींव लिए हुए थे। नौजवानों जैसा उत्साह उनमें सदा रहा। सादा जीवन, उच्च विचार का उन्होंने आजीवन पालन किया।वह अत्यधिक मितव्ययी थे। परतंत्रता काल में ही उन्होंने खादी पहनना शुरू कर दिया था।वह महात्मा गांधी के सच्चे अनुयायी थे।वे अपना प्रत्येक कार्य स्वयं करना पसन्द करते थे।उनकी प्रशंसा वे ब्रिटिश अधिकारी तक करते नहीं थकते थे।जो कि राजनैतिक दृष्टि से उन्हें अपना शत्रु समझते थे।उन्होंने कभी भी किसी से नाजायज पैसा नहीं लिया।साधन व साध्य दोनों की पवित्रता उनके लिए सर्वोपरि थी।उनकी वकालत न्याय व ईमानदारी की वकालत थी।वह बहुत ही संतोषी और विनम्र थे।यदि उन्हें धन से मोह होता तो वे अपने पदों व स्थितियों का दुरूपयोग करके बहुतेरा धन कमा सकते थे,किन्तु उन्होंने ऐसा कभी भी सोचा तक नहीं।उन्होंने अपने गांव की जमीन व मकान आदि अपने कुछ परिवारीजनों को यों ही सौंप दिए थे, जिसकी एवज में उन्होंने उनसे कभी भी कुछ नहीं लिया।ऐसे उदाहरण आज के समय में कहां देखने को मिलते हैं?
स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी की सौम्यता, ईमानदारी, निर्भीकता और न्यायप्रियता आदि सद्गुणों के अनेकों ऐसे उदाहरण हैं, जिनसे उनके उदात्त व मानवतावादी दृष्टिकोणों का पता चलता है।मैनपुरी जनपद के लिए उनकी एक नहीं अपितु अनेकों देनें हैं।जिनकी वजह से आगामी पीढ़ियां उन्हें याद करके उन पर गर्व करती रहेंगी।मैनपुरी के करहल रोड़ की और संता-बसंता चौराहा से राजा के बाग तक पक्की सीमेंटेड सड़कें सर्वप्रथम मैनपुरी की जिला परिषद् के द्वारा तब बनवायी गईं थी, जबकि उसके चेयरमैन स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी हुआ करते थे।मैनपुरी की जिला परिषद् की आय बढ़ाने हेतु भी वो सदैव प्रयत्नशील रहे।यमुना नदी के नौरंगी घाट पर टोल टैक्स के रूप आगरा की जिला परिषद् को जो आय होती थी, उसका एक चौथाई भाग स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी के व्यक्तिगत प्रयासों से ही मैनपुरी की जिला परिषद् को मिलना प्रारम्भ हुआ; क्योंकि वो आगरा व मैनपुरी दोनों ही जिलों से जुड़ा हुआ क्षेत्र था।वे जब मैनपुरी की जिला सहकारी बैंक के प्रबंध संचालक थे, तब वे बैंक के कार्यों से जब भी ट्रेन द्वारा मैनपुरी से बाहर जाते थे तो वे तीसरे दर्जे में ही यात्रा करते थे, जबकि वे प्रथम दर्जे में यात्रा करने के अधिकारी थे।प्रादेशिक सहकारिता संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने बिना कोई भत्ता या पारिश्रमिक लिए बगैर अपने दायित्वों का निर्वाह किया।मैनपुरी की रियासत “कोर्ट ऑफ वार्ड” से उनके प्रयासों से छूटी थी। सन् 1962 में मैनपुरी के गुरुचरण इंडस्ट्रियल वर्क्स ने अपने सर्वप्रथम राइस प्लांट का निर्माण किया था, किन्तु इस प्लांट को मैनपुरी नगर में कोई भी व्यक्ति खरीदने के लिए तैयार नहीं था।क्योंकि उसकी सफलता पर लोगों को संदेह था।परन्तु स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी ने अपने जय हिंद राइस एण्ड जनरल मिल्स के लिए इस प्लांट को खरीदा और लोगों के संदेह को हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त किया।
विडंबना इस बात की है कि इस सब के बावजूद भी स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी की स्मृति-रक्षा हेतु मैनपुरी नगर में अभी तक कहीं भी कोई कार्य नहीं किया गया है।मैनपुरी की जिला परिषद् , जिला सहकारी बैंक, नगर पालिका, लाल सूरज भान सिंह पुस्तकालय, जिला बार एसोसिएशन, एवं सिविल बार एसोसिएशन आदि सभी का यह दायित्व बनता है कि वे स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी का समय-समय पर स्मरण कर उनकी स्मृति-रक्षा हेतु कुछ ठोस कार्य करें।जिससे नई पीढ़ी उनसे प्रेरणा ग्रहण कर सके।

(लेखक स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी के यशस्वी सुपौत्र हैं।)

डॉ. गोपाल चतुर्वेदी
एडवोकेट/वरिष्ठ पत्रकार
कोठी स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी, कोतवाली के पीछे, कचहरी रोड़, मैनपुरी-205001 (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल – 9412178154

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