अपराध

महाभ्रष्टाचार के अड्डे हैं,फर्म्स, सोसाइटीज एवं चिट्स के कार्यालय

तफतीश
डॉक्टर बचन सिंह सिकरवार

कार्यालय,  फर्म्स, सोसाइटीज एवं चिट्स, आगरा 

किसी भी संस्था के विधिवत संचालन,उसकी साख और विश्वसनीयत को सुदृढ़ करने लिए ‘सोसाइटी रजिस्टेशन एक्ट अधिनियम-1860 बनाया गया, ताकि उस पर भरोसा कर लोग और शासन उससे जुड़कर उसका हर तरह का सहयोग तथा सहायता प्रदान कर सकें। लेकिन इस अधिनियम को लागू कराने वाले घूसखोरी कर न केवल इसके उद्देश्य के सर्वथा विपरीत कार्य करते हैं, बल्कि घूस खाकर सोसाइटियों में विवाद पैदा कर,उसके फर्जी तरीके से सदस्य बनाकर किसी को भी किसी भी संस्था को स्वामी तक बना देना है। विवाद की स्थिति में इस कार्यालय के कर्मचारी/अधिकारी येनकेन प्रकारेण यानी किसी भी तरह से दाम देने वाले को शर्तियाँ जिता देते हैं। इनकी रिश्वत की रकम उस संस्था की सम्पत्ति के मूल्य या उससे होने वाली आय के आधार पर तय कर वसूली जाती है,लेकिन अफसोस की बात यह है कि ऐसे महाभ्रष्ट अधिकारियों तथा कर्मचारियों को आज तक किसी भी भ्रष्टाचार निरोधक एजेन्सी, प्रशासन स्तर या न्यायालय द्वारा नमूने की सजा नहीं दी गई है, इसलिए ये कार्यालय बेखौफ लोगों को लूटने के साथ संस्थाओं बर्बाद करा रहे हैं। भ्रष्टाचार के अड्डे बने, फर्म्स, सोसाइटीज एवं चिट्स कार्यालयों के बारे में यह कहना गलत नहीं होगा, जिसकी होगी,जितनी जेब भारी, तब उसकी जीत सुनिश्चित मानो। आगरा के सेक्टर-12 ए/339 आवास विकास, सिकन्दरा, आगरा-282007 स्थित क्षेत्रीय कार्यालय-उपनिबन्धक फर्म्स, सोसाइटीज एवं चिट्स इसका एक उदाहरणभर है। वस्तुतः विद्यालय, महाविद्यालय, समाज सेवा के लिए संस्था का गठन किया जाना आवश्यक होता है, इसके लिए फर्म्स, सोसाइटीज एवं चिट्स के कार्यालय में पंजीकरण कराना जरूरी होता है। इसी अनिर्वायता का यह कार्यालय भरपूर/बेजां फायदा उठाता आया है। इस कार्यालय के अधिकारी/कर्मचारियों की खुली लूट से कितने लोग परेशान हैं,इस हकीकत को यहाँ आकर देखा-सुना जा सकता है।
फर्म्स, सोसाइटीज एवं चिट्स के उपनिबन्धक को सोसाइटी रजिस्टेªशन एक्ट के अनुसार आवश्यक पत्राजातों की जाँच प्रक्रिया पूर्ण कर तथा नियत शुल्क लेकर फर्म्स, सोसाइटी,चिट्स को पंजीकरण कराना होता है, उसे कोई अर्द्ध न्यायिक/न्यायिक अधिकार भी प्राप्त नहीं है, फिर भी ये उपनिबन्धक अपने कार्यालय के बेताज बदशाह हैं। धन के रूप में इनकी माँग न पूरी करने की दशा में इनके कार्यालय का पत्ता तक नहीं खड़कता। उपनिबन्धक कार्यालय में बगैर चढ़ावा चढ़ाये किसी भी संस्था का पंजीकरण कराना मुश्किल ही नहीं, असम्भव हैं, भले ही संस्था को चलाने का उद्देश्य कितना ही पवित्र और देश-समाज के लिए कल्याणकारी क्यों न हो? इनके लिए स्वतंत्रता सेनानियों का संगठन हो या अनाथालय/विधवा/वृद्धाश्रम हो, या फिर गौशाला इत्यादि इससे इनकी सेहत/ रिश्वत की वसूली दर पर कोई फर्क नहीं पड़ता। रिश्वत न देने की स्थिति में उपनिबन्धक कार्यालय के कर्मचारी/अधिकारी संस्था के पत्राजातों में तब तक तमाम तरह की त्रुटियाँ-कमियाँ/खामियाँ निकालते रहते हैं, जब तक वह व्यक्ति रिश्वत के रूप में उनकी मुँहमाँगी रकम नहीं चुका देता है। वैसे उपनिबन्धक कार्यालय में संस्था के पंजीकरण,नवीनीकरण, किसी भी मामले में फाइल के निरीक्षण या उससे किसी दस्तावेज की फोटो प्रति लेने की नियत शुल्क हैं। पर यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि नियत सरकारी के शुल्क के साथ-साथ इन सभी कार्यों के लिए अलग-अलग सुविधा शुल्क भी निर्धारित है। यहाँ तक संस्था के पंजीकरण या नवीनीकरण की शुल्क जमा कराने के लिए भी आपकों अलग से अट्टी ढिली करने को मजबूर होना पड़ता है। इस कार्यालय के अधिकारी इतने बेखौफ है कि वे उच्च न्यायालय के आदेशों के उल्लंघन करने से भी नहीं डरते,क्यों कि वह स्पष्ट आदेश पारित करने के बजाय ज्यादातर मामलों को निर्देश के साथ इन्हें लौटा देता है। इनकी शिकायत पर इनके उच्च अधिकारी और शासन स्तर पर भी सुनवायी नहीं होती, इससे यही लगता है कि ये सभी कहीं न कहीं आपस एक-दूसरे से जुड़े हुए है। इसी कारण एक से एक भ्रष्ट अधिकारियों को इन कार्यालयों को चलाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है।
शासन ने लोगों को भ्रष्टाचार से छुटकारा दिलाने के लिए संस्थाओं के ऑन लाइन पंजीकरण तथा नवीनीकरण कराने के लिए व्यवस्था की है, लेकिन इसके लिए दस्तावेजों का सत्यापन उपनिबन्धक एवं उसके कार्यालय के लिपिकों से कराना जरूरी है,जो बगैर के वसूली के नहीं करते। यह भी तब जबकि भारत सरकार के आदेशानुसार दस्तावेजों के स्वयं सत्यापित करने का आदेश पारित किया हुआ है, पर व्यावहारिक रूप से ऐसा हो नहीं रहा है। आगरा स्थित उपनिबन्धक फर्म्स, सोसाइटीज एवं चिट्स के मण्डलीय कार्यालय से आठ जिले सम्बद्ध हैं। इस कार्यालय में आठ लिपिक हैं। इनमें से प्रत्येक लिपिक को एक जिले की संस्था के पंजीकरण करने की जिम्मेदारी दी गई, वहीं उसी लिपिक को दूसरे जिले के नवीनीकरण करने का कार्य सौंपा गया है।
जानकारों के अनुसार इन्हें अपनी वसूली रिश्वत में से आधी धनराशि उपनिबन्धक को तथा बाकी स्वयं और साथियों के बीच बाँटनी होती है। पंजीकरण प्रमाण पत्र पाने के लिए डिस्पेच कलर्क को एक सौ रुपए देने होते हैं, तभी उस पर कार्यालय की मुहर लगाने के बाद ही उसे प्रेषित करता है, अन्यथा वह चक्कर लगवाता रहेगा। यहाँ के लिपिकों ने रिश्वत लेने के लिए कार्यालय के आसपास अपने एजेण्ट बैठा रखे हुए हैं। इनमें से कुछ के परिवारीजन हैं तो कुछ के रिश्तेदार हैं, जो लोगों से चौथ वसूलने के बाद इन तक पहुँचाते हैं। जो फोटास्टेट से लेकर टाइपिंग की दुकान चला रहे हैं। बाहर बैठे लोगों के पास कोई विधिक लाइसेन्स नहीं है। कई बार लिपिक भी रिश्वत की रकम को बाहर बैठे टाइपिस्ट/दलालों के माध्यम से लेना पसन्द करते हैं।
जानकारों के मुताबिक इस कार्यालय के क्लर्क हर रोज औसतन कई हजार रुपए कमाते हैं,पर सरकारी स्तर पर आजतक इनकी सम्पत्ति की जाँच नहीं करायी गई है।यहाँ तक कि आगरा के कार्यालय में महिला कर्मचारी को भी अपनी ड्यूटी से इतर काम कराने आने वालों की पैरवी करते देखा जा सकता है।
पीड़ितों के अनुसार इस कार्यालय में किसी संस्था का नया पंजीकरण हो या फिर उसका नवीनीकरण का मामला हो,सुविधा-शुल्क दिये न पंजीकरण होता और न नवीनीकरण ही। रिश्वत न देने के दशा में आपके कागजातों में कमियाँ दशाते हुए नोटिस जारी होते रहेंगे, या फिर आपकी फाइल को ठण्डे बस्ते में डाल दिया जाएगा,किन्तु जब जेब गरम करने के बाद बहुत सारे दस्तावेज ये खुद ही तैयार करा देते हैं। उपनिबन्धक कार्यालय के अधिकारी /कर्मचारी उस पक्ष को अधिक महत्त्व देता है, जो पक्ष अनधिकृत रूप से उस पर कब्जा करना चाहता है, क्योंकि वही उनकी जेब में मन चाही रकम रिश्वत के रूप में डाल सकता है। इस कारण अधिकांश मामलों में कामयाबी गैरकानूनी पक्ष को ही हासिल होती है। ऐसे में 10-20लाख रुपए खर्च कर कोई भी व्यक्ति करोड़ों रुपए की सम्पत्ति का आसानी से स्वामी बन जाता है। ऐसे में भूमि खरीदकर ,इमारत बनवाने,उसके लिए मान्यता के लिए दर-दर भटकने के बाद महाविद्यालय खोलने की आवश्यकता ही है क्या है? इससे बेहतर होगा कि कुछ लाख रुपए उपनिबन्धक कार्यालय में रिश्वत देकर उस महाविद्यालय की सोसाइटीज पर कब्जा कर चलते महाविद्यालय का स्वामी बन लिए जाए। इस महाभ्रष्ट कार्यालय के कारण नई-पुरानी संस्थाएँ सुरक्षित नहीं हैं। इसका कारण यह है कि संस्था के प्रारम्भिक सदस्यों के वृद्ध या देश के दूसरे नगरों या विदेश में बसने या फिर उनकी नई पीढ़ी के अपेक्षित रुचि न लेने के कारण चतुर/बेईमान लोग घूस देकर उन संस्थाओं पर बड़ी आसानी से काबिज होकर उन्हें खुर्दबुर्द कर देते हैं। आगरा कार्यालय के पूर्व में एक कलर्क रंगे हाथ रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया था। उस समय यह कार्यालय ईदगाह में था। वही कलर्क आजकल इसी कार्यालय में कार्यरत है और सेवानिवृत्ति के निकट पहुँच गया है और जिस पीड़ि़त द्वारा इस कलर्क को पकड़वा गया था, वह न्याय पाने को दर-दर की ठोकर खा रहा है।
यदि क्षेत्रीय उपनिबन्धक के कार्यालय में आपके पत्राजात विधिसम्मत हैं लेकिन किन्हीं कारणाओं से भेंट-पूजा नहीं की गई,उस दशा में किसी बहाने से उपनिबन्धक द्वारा विवाद पैदा कर या दर्शा कर धारा 25(1) के अन्तर्गत उस विवाद को निस्तारण के लिए विहित अधिकारी/उपजिलाधिकारी को भेज दिया जाता है, जिनके कार्यालय में कभी उस अधिकारी के दौरों के या किसी और वजह से न्यायालय में न बैठने, या फिर अधिवक्ताओं/कर्मचारियों की शोकसभा, विभिन्न कारणों से हड़ताल कई-कई साल तक उसका निस्तारण नहीं होता। वैसे वहाँ भी सुविधा शुल्क के बगैर निर्णय करा पाना असम्भव है। ऐसे में लोग उपनिबन्धक कार्यालय में ही अपने मामले का निस्तारण कराने में भलाई समझते हैं।
सम्पर्क-डॉ.बचन सिंह सिकरवार 63ब,गाँधी नगर,आगरा-282003 मो.नम्बर-9411684054