अपराध

क्या जुर्म है सवर्ण होना?

साभार सोशल मीडिया

डॉ.बचन सिंह सिकरवार

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गत दिनों आगरा में बच्चों के विवाद के बाद एस.सी.-एस.टी.अधिनियम के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज कराये जाने के बाद सेवानिवृत्त फौजी की पत्नी को जिन्दा जलाये जाने की अत्यन्त दुःखद और उक्त अधिनियम के दुरुपयोग का प्रबल प्रमाण है। फिर भी इस मामले में पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों से लेकर ज्यादातर पंथ निरपेक्ष विशेष रूप से काँग्रेस, सपा, बसपा और मिथ्या आरोप लगाने में सिरमौर ‘आप’ जैसे राजनीतिक दलों और असहिष्णुता तथा मानवाधिकारों का राग अलापने वाले गिरोह के सदस्यों की खामोशी आप को हैरान-परेशान करने वाली भले ही लगती हो, लेकिन इसकी असल वजह पीड़ित का सवर्ण राजपूत और आरोपी का दलित होना है। इसी लिए इस मामले में जहाँ जाति, मजहब और उस राज्य में अपनी-परायी सियासी पार्टी के शासन को देख कर दुःख जताने का ढोंग करने वाली सियासती पार्टियों को संवेदना व्यक्त करना और न्याय की दिलाने की माँग करने से परहेज कर रही है, वहीं शासन-प्रशासन और पुलिस अधिकारी इस मामले को ठण्डा करने और दबाने में जुटी है। कमोबेश यही हालत देश की कथित सिविल सोसायटी, कथित बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, कवियों, लेखकों,फिल्मी-गैर फिल्मी कलाकारों की है,जिनकी दृष्टि में कुछ विशेष जातियों, अल्पसंख्यक समुदाय, देश और हिन्दुओं के खिलाफ विचार रखने और उनके विरुद्ध काम करने वाला ही हर हाल में पीड़ित है और उसके ही बस मानवाधिकार हैं। कुछ ऐसी स्थिति जनसंचार माध्यमों विशेष रूप से टी.वी. चैनलों का है, जिन्होंने आगरा की दिल दहलाने वाली इस घटना को टी.वी.पर प्रसारित करने लायक खबर नहीं समझा। क्या सवर्ण महिला को दलितों द्वारा जलाये जाने की घटना से टी.आर.पी.नहीं मिलती? क्या सिर्फ अल्पसंख्यक या दलित के खिलाफ सवर्ण आरोपी हो, तभी टी.आर.पी. के योग्य समाचार बनता है, यह प्रश्न विचारणीय है?

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हालाँकि इस मामले में लापरवाही बरतने के आरोप में एकता पुलिस चौकी प्रभारी दारोगा योगेश कुमार को लाइन हाजिर कर दिया गया, लेकिन प्रश्न यह है कि जब आरोपी भरत खरे अपनी असली जाति छुपाकर रह रहे थे, तब पीड़ित अनिल राजावत ने उन्हें जाति सूचक शब्द या फिर जाति विशेष का जानकर किसी तरह का व्यवहार कैसे किया होगा? अगर नहीं, तो उनके खिलाफ एस.सी.-एस.टी.अधिनियम में मुकदमा दर्ज कैसे दर्ज किया गया? ऐसे में उस दारोगा को खिलाफ लाइन हाजिर किये जाने को क्या पर्याप्त दण्ड समझा जाए? इतना ही नहीं,पुलिस के उच्च अधिकारी भी पीड़ित अनिल राजावत द्वारा चौकी प्रभारी दारोगा योगेश कुमार के 60हजार रुपए की रिश्वत लेने के आरोप की जाँच में भी गम्भीरता नहीं दिखा रहे हैं।
इस मामले में कोई भी जाँच एजेन्सी ने सच्चाई जानने को उत्सुकता दिखायी नहीं दे रही है, क्योंकि सवर्ण और विशेष रूप से राजपूतों के प्रति संवेदना जताने और न्याय दिलाने में किसी भी राजनीतिक दल और किसी संगठन को दिलचस्पी नहीं है। घटना कुछ इस प्रकार है- आगरा के ताजगंज के पुष्पांजलि ईको सिटी कॉलोनी निवासी सेवानिवृत्त फौजी अनिल राजावत अपनी पत्नी संगीता और आठ वर्षीय दो जुड़वा बच्चों के साथ रहते हैं। इसी सोसायटी में उनके पड़ोसी भरत खरे अपनी पत्नी सुनीता और दस वर्षीय बेट के सहित रहते थे। पिछले दिनों इन बच्चों के बीच किसी बात में मारपीट हो गयी। बाद में 7अक्टूबर को ही भरत खरे ने पुलिस चौकी में फौजी अनिल राजावत और उनकी पत्नी संगीता के विरुद्ध मारपीट और एस.सी.-एस.टी.अधिनियम में एकता पुलिस चौकी में रिपोर्ट दर्ज करा दी,जबकि भरत खरे इस सोसायटी में अपनी वास्तविक जाति छुपाकर कायस्थ बन कर रहे थे। वह इस सोसायटी के अध्यक्ष भी रह चुके थे,किन्तु किसी को यह ज्ञात नहीं था कि वास्तव वह किस जाति के हैं? इसके बाद 10अक्टूबर को चौकी प्रभारी दारोगा योगेश कुमार ने अनिल कुमार को चौकी में बुलाकर अवैध रूप से दस घण्टे बैठाये रखा और समझौते के लिए दबाव बनाया। फिर उनकी पत्नी संगीता के आने पर उससे अभद्र व्यवहार किय। उसके बाद 60हजार रिश्वत लेकर छोड़ा। इनमें संगीता ने 20 हजार रुपए अपने ए.टी.एम. तथा बाकी रिश्तेदारों से लेकर एकत्र किये थे। रिश्वत लेने के बाद चौकी प्रभारी दारोगा योगेश कुमार ने एस.सी.-एस.टी.एक्ट हटा लेंगे। इसके बाद 11अक्टूबर को चौकी प्रभारी योगेश कुमार के कहने पर पंचायत आहूत की गई। बताया जाता है कि इस पंचायत में भरत खरे के रिश्तेदारों और समर्थकों ने अनिल राजाावत को 10लाख रुपए और सभी के समक्ष संगीता से पाँव छूकर माफी माँगने को कहा।इस पर अनिल राजावत ने इतनी बड़ी रकम देने में अपनी असमर्थता जतायी और पत्नी संगीता ने हाथ जोड़ का माफी माँगी,लेकिन इतने से भरत खरे और उसके समर्थक सन्तुष्ट नहीं हुए। इस बीच 11अक्टूबर को इन्हीं में से किन्हीं लोगों ने संगीता पर ज्वलशील पदार्थ उड़ल कर आग लगा दी, जिसमें वह 90प्रतिशत तक जल गईं। उसके बाद उपचार के दौरान संगीता ने कुछ लोगों के नाम बताने की कोशिश की। तदोपरान्त आगरा के पश्चात् दिल्ली के अस्पताल में मौत हो गई। तब कुछ स्थानीय समाचार पत्रों में खबर प्रकाशित होने पर जैसे-तैसे भरत खरे और उसकी पत्नी के विरुद्ध 12अक्टूबर को हत्या को मुकदमा दर्ज गिरपतार कर जेल दिया गया। उसके बाद साजिश शामिल होने के आरोप में उसके समर्थक पड़ोसी सोनू सक्सेना और कपिल श्रीवास्तव को गिरपतार कर जेल भेजा जा चुका है, और बाकी को पकड़ने जाने हैं। भरत खरे के समर्थक के रूप में सोनू सक्सेना,कपिल श्रीवास्तव की गिरपतारी से भी लगता है,ये दोनों उसकी सहायता सजातीय यानी कायस्थ होने के नाते कर रहे होंगे। पूर्व सैनिको ने कलक्टेªट में पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों को ज्ञापन देकर आरोपी दारोगा योगेश कुमार को मुुकदमे में शामिल करते हुए जेल भेजे जाने की माँग की है। कमोबेश यही माँग क्षत्रिय संगठन कर रहे हैं।लेकिन जिस गति से जाँच आगे बढ़नी चाहिए थी,वैसी नहीं हो रही है। जिन सियासी पार्टियों ने हाथरस काण्ड में राज्य सरकार पर वांछित कार्रवाई न किये जाने के गम्भीर आरोपों लगाये थे, वे आगरा की सवर्ण राजपूत महिला को जिन्दा जलाये जाने पर खामोश हैं। हाथरस काण्ड में ‘आप’ के सांसद संजय सिंह ने तो मुख्यमंत्री पर उनकी जाति का होने की वजह से बचाने का भी आरोप लगाने में शर्म महसूस नहीं की। अब झूठे आरोप लगाकर माफी माँगने में सबसे आगे रहने वाली ‘आप’ पार्टी के नेता संजय सिंह आगरा प्रकरण पर क्या कहेंगे?क्या राजपूत महिला को जिन्दा रहने का अधिकार नहीं है? उसकी जान का कोई मोल नहीं है? क्या उनकी पार्टी को राजपूत के वोट नहीं चाहिए?एक बार फिर हमारा सवाल देश के लोगों से क्या सवर्ण विशेष रूप से राजपूत होना क्या अपराध है?उन्हें इस देश के संविधान और दूसरे कानून के तहत न्याय पाने का कोई अधिकार नहीं हैं? देश के लोगों को जाति/धर्म/सम्प्रदाय और अपनी तथा परायी पार्टी का शासन देखकर पीड़ित/मजलूम के प्रति संवदेना व्यक्त करने और न्याय दिलाने की माँग करने वाले ये ढोंगी और इन्सानियत के दुश्मन हैं,उनका हर हाल में सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। ये लोग अपने सियासी फायदे देखकर समाज को बाँटने और नफरत फैलाने जैसा घृणित कार्य कर देश की एकता और अखण्डता को कमजोर करने में तनिक भी संकोच नहीं करते। ऐसे शैतानों और देश के दुश्मनों को सबक सिखाने को समाज को आगे आना ही होगा।
सम्पर्क-डॉ.बचन सिंह सिकरवार 63ब,गाँधी नगर,आगरा-282003मो.नम्बर-9411684054