डॉ. अनुज कुमार सिंह सिकरवार
इसकी क्षुप गीली तथा तर जमीन में पैदा होती है। सम्पूर्ण भारत में जल के आस-पास यह पायी जाती है। बंगाल के लोग इसका साग खाते हैं। संथाल परगना में इसको ‘जेम्हा घास’ के रूप में जानते हैं। इसका क्षुप मण्डुक पर्णी से छोटा तथा सघन होता है। पत्ते मोटे तथा पतले होते हैं। कुछ लम्बाई लिए हुए होते हैं। इसके फूल रक्त के समान लाल होता है। इसका स्वाद कड़वा होता है।
औषधीय उपयोग/दोष और प्रभाव – यह शीतल औषधि है। कब्ज को मिटाती है। पचने में हल्की है। बुद्धिवर्द्धक है। किसी भी प्रकार के अरिष्ट का नाश करती है। रसायन गुण सम्पन्न है। स्वर को उत्तम करने वाली हैं। यह पेशाब से सम्बन्धित सभी बीमारियों को भी मिटाती है। हृदय के रोगी को यह जीवन दान देती है। सूजन और ज्वर को भी मिटाती है। यह क्षय की भी अच्छी औषधि है। सभी कुष्ट रोगों को दूर करती है। मस्तिष्क पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ता है। मज्जा तन्तुओं को बल देकर यह शान्ति प्रदान करती है। मीर्गी और हिस्टीरिया के रोग को यह ठीक कर देती है। यह अति उत्तम स्नायु पौष्टिक है। श्वांस दमा में इसका व्यवहार किया जाता है। पूर्णतः पागलपन की अवस्था में भी इस जड़ी का सफल व्यवहार ग्रामीण लोग करते हैं। कुछ लोग इसको साँप के काटने के बाद रोगी को पिलाते हैं और लाभ की अनुभूति भी करते हैं।
औषधीय उपयोग/व्यवहार विधि – इस औषधि को संग्रह कर सुखाकर उसका चूर्ण बना ले 2 से 5 ग्राम प्रतिदिन इसके सवेन से उपरोक्त सभी रोगों में लाभ होता है। इसके 10 ग्राम पौधा को कूटकर 100 ग्राम पानी में उबालें, जब 25 ग्राम रह जाए, तब उसे छान कर प्रतिदिन पिलाने से भी सभी रोगों में लाभ मिल जाती है।
आर्थिक दृष्टि से इसकी खेती रू इस औषधि की माँग विश्वव्यापी है। इसमें से कुछ रसायन तत्त्व निकाले जाते हैं। आयुर्वेद होम्यिापैथिक तथा आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की फार्मेसी भी इससे दवा बनाते है। अतः इसकी खेती आर्थिक विकास में काफी सहायक हो सकती है।





















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