डॉ. अनुज कुमार सिंह सिकरवार

इसकी पहचान भारतवासियों को बहुत पूर्व से ही है। इसका पौधा हुबहु तुलसी के पौधों के समान होता है,किन्तु पत्ते थोड़े चौड़े एवं नुकीले होते हैं। मंजर कुछ बड़े तथा ज्यादा काले होते हैं। ओझा लोग विश्वास करते हैं कि इसके सुगन्ध के प्रभाव से किसी भी प्रकार की दुष्ट आत्माएँ नजदीक नहीं आती।
औषधीय उपयोग/गुण – आसवन विधि से इसके सुगन्ध तेल इत्यादि निकाले जाते हैं इसकी पत्तियाँ प्रेतावेशा जैसी बीमारियों एवं सर्दी खाँसी में उपयोगी है। ग्रामीण ओझा वैद्य कठिन से कठिन बीमारियों में भी इसका प्रयोग करा कर लाभ लेते देखे गये हैं। इस पौधा को प्रत्येक घर में होना चाहिए। इस पौधे के नजदीक बैठ कर पौधों को धीरे-धीरे सहलाकर उनका सुगन्ध 5 से 30 मिनट प्रतिदिन लेने से सभी रोगो में लाभ होता हैं। मन मस्तिष्क को शान्ति मिलती है। रक्त वात के रोग मिटते हैं। खिंचाव तनाव से यह मुक्त करता है। प्रसन्नता लाता है। इसमें अनेक ऐसे तत्त्व है, जिसे आसवन विधि से प्राप्त किया जाता है।
मात्रा – सम्पूर्ण पौधा का चूर्ण 1 से 2 ग्राम प्रतिदिन खाने से वात कफ के सभी रोग मिटते हैं, इसकी सुगन्ध को आसवन विधि से निकालकर इसे बाजार में बेचा जा सकता है। तुलसी वर्ग के पौधों के आसवन विधि से ही इसकी भी सुगन्ध या तेल निकाला जाता है। इसकी खेती स्वास्थ्य लाभ तथा धन अर्जन के लिए उपयोगी है। दवना जाति के अनेक पौधे झारखण्ड में मिलते हैं। उन सबका गुण लगभग मिलता जुलता है, जिनकी खेती उपयोगी हो सकती है।






















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