राजनीति

आखिर क्या चाहते हैं इस मुल्क के मुसलमान ?

डॉ.बचन सिंह सिकरवार
हाल में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के बजट सत्र में सत्तारूढ़ नेशनल कान्फ्रेंस, सहयोगी काँग्रेस समेत मुख्य विपक्षी राजनीतिक दल ‘पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी’(पी.डी.पी.), पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, निर्दलीय विधायकों द्वारा ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों के विरोध और ईरान के प्रति सहानुभूति में काली पट्टी बाँधने, ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के चित्र और अमेरिका के खिलाफ नारे लिखे पोस्टर लिए जिस तरह ‘ट्रम्प हाय-हाय‘, ‘ईरान जिन्दाबाद‘, ‘नारा-ए-तकबीर,अल्लाह हो अकबर’ जैसे नारे लगाना और फिर उनके विरोध में भाजपा के विधायकों द्वारा ‘वन्दे मातरम्, ‘भारत माता की जय नारे लगाए जाना और ईरान पर हमलों के खिलाफ सदन में चर्चा की माँग की गई, इस घटना से अपने देश के लोगों को भले ही दुःख और आश्चर्य नहीं हुआ हो, किन्तु उनके इस अनुचित रवैये पर दुनियाभर के लोगों को अचम्भा ही नहीं, उनकी अपने देश के प्रति निष्ठा पर भी सन्देह जरूर हो रहा होगा? इस मुद्दे पर दुनिया भर में सिर्फ पाकिस्तान के शियाओं और भारत के शिया समेत दूसरे मुसलमानों के अलावा किसी भी मुस्लिम देश ने ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले की मजम्मत नहीं की। यहाँ तक कि ईरान की हिमायत में अपने देश के मुसलमानों के उग्र और हिंसक प्रदर्शन से खफा होकर पाकिस्तान के सर्वोच्च सैन्य अधिकारी आसिम मुनीर ने उन्हें फटकर लगाते हुए कहा,‘‘जो शिया ईरान से इतनी मुहब्बत करते हैं,उन्हें वहीं चले जाना चाहिए।’’लेकिन इससे हिन्दुस्तानी मुसलमानों ने कोई सबक नहीं लिया। जहाँ भारत में इनके प्रदर्शनों को शान्तिपूर्ण तरीके से होने दिया, वहीं पाकिस्तान में उससे शक्ति से निपटा गया है।
इस मामले पर इस्लामिक देशों का सबसे बड़ा संगठन ऑर्गनाइजेेशन ऑफ इस्लामिक कॉरपोरेशन’ (ओआईसी) में खामोश है,जिसके 57मुसलमान देश सदस्य हैं। कमोबेश यही रवैया ‘खाड़ी सहयोग संगठन’ का रहा है। इतना ही नहीं, ईरान के 13 पड़ोसी मुल्कों में से एक भीे उसके साथ नहीं है। यहाँ तक कि ईरान खाड़ी के पड़ोसी मुल्क सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ओमान, बहरीन, जॉर्डन, साइप्रस पर मिसाइल दाग रहा है। उसने सऊदी अरब के सबसे बड़े तेल शोधक कारखाने को बर्बाद कर दिया है। यह जानते हुए भी जम्मू-कश्मीर के इन विधायकों को शायद ही अपने किये पर शर्म आए?इसकी वजह इनमें से कुछ के लिए अपने देश से बढ़कर मजहब/उम्मा(हममजहबी समुदाय) जो है, बाकी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों के लिए उनके एक मुश्त वोट की चाहत/दरकार होना है। इसके बावजूद देश के मुसलमानों की हमदर्दी हासिल करने को सियासी पार्टियाँ ईरान के मुद्दे पर केन्द्र सरकार की नीति की आलोचना करते हुए उसका साथ देने का बराबर दबाव बना रही है,जबकि भारत सरकार अपने राष्ट्रीय हितों को दृष्टिगत रखते हुए तटस्थ नीति पर चल रही है। भारत ने श्रीलंका से कुछ दूरी पर हिन्द महासागर में खड़े ईरान के जलपोत पर अमेरिकी हमले के बाद उसके नौसैनिकों को बचाने को अपनी नौसैनिक भेजे। भारत ने ईरान के एक जलपोत को कोच्चि बन्दरगाह पर शरण दी और उसके नौसैनिकों की सुरक्षित स्वदेश वापसी की। भारत के विदेशमंत्री और प्रधानमंत्री खाड़ी देशों के शासनाध्यक्षों समेत ईरान के राष्ट्रपति तथा विदेशमंत्री से लगातार बातचीत कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुरू से कहा कि युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है। इसे कूटनीति और संवाद से हल किया जाना चाहिए। फिर भी विपक्ष उन पर अमेरिका के दबाव कार्य करने के मिथ्या आरोप लगाता आ रहा है,जबकि प्रधानमंत्री ने इस राष्ट्रपति ट्रप से एक बार भी बात नहीं की है। यह अलग बात है कि वहाँ से उन्हें फोन अवश्य आया है। यही कारण ईरान ने हाल में अपना दोस्त कहा है।
इन से पहले अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर जम्मू-कश्मीर से लेकर केरलम तक हजारों की तादाद में सड़क पर शिया मुसलमान कई दिनों तक छाती पीटते मातम मानते अमेरिका और इजरायल के खिलाफ नारेबाजी कर उग्र और हिंसक प्रदर्शन कर चुके हैं,सुनने यह आया हैकि इन्होंने धन भी एकत्र कर ईरान को भेजा है।ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले पर देश के मुसलमानों विशेष रूप से शियाओं के उग्र विरोध और उनकी एकजुटता देखते हुए तथाकथित सेक्युलर सियासी पार्टियाँ आँखें बन्द कर उनके समर्थन में आयी हुई हैं,वे केन्द्र सरकार पर ईरान से सर्वोच्च मजहबी नेता अयातुल्ला खामेनेई की बमबारी में हुई मौत पर तत्काल शोक न जताने को लेकर निन्दा/आलोचना/मजम्मत कर रही हैं और इसे देश के वर्तमान तेल संकट की वजह साबित करने पर तुली हैं,जबकि भारत सरकार के विदेश सचिव विक्रम मिस्त्री नई दिल्ली स्थित ईरान के दूतावास में शोक पुस्तिका खुलते ही शोक संदेश अंकित कर आए। जहाँ तक राष्ट्रीय स्तर पर शोक व्यक्त करने का प्रश्न है तो वे ईरान के किसी संवैधानिक पद पर नहीं थे। फिर स्वयं इस्लामी कट्टरवादी होने के नाते उन्होंने अपने मुल्क में महिलाओं पर तमाम पाबन्दियाँ लगा रखी थी और विरोधियों का जुल्म ढहाने पर कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी थी।।वह इजरायल को दुनिया के नक्शे से मिटाने और यहूदियों का सफाया करने के धमकी देते आए थे। साथ ही दुनिया में दहशतगर्द संगठन-यमन ‘हूती’, लेबनान में ‘हिजबुल्लाह‘, गाजा में ‘हमास‘ के सबसे बड़े मददगार थे। जहाँ तक ईरान और उसके नेता अयातुल्ला अली खामेनेई का सवाल है तो ईरान से भारत के सदियों पुराने कई तरह के सम्बन्ध रहे हैं। पर इस्लामिक मुल्क होने के नाते अपवादस्वरूप एक आध मौका छोड़कर भारत का विरोध और पाकिस्तान की हिमायत और भारत से जंग में उसकी मदद करता रहा है। इसके नेता अयातुल्ला अली खामेनेई विशेष रूप से कश्मीर और भारतीय मुसलमानों के मुद्दे उठाकर बदनाम करते आ रहे।इसके विपरीत इजरायल ने अमेरिकी प्रतिबन्ध के रहते 1971में भारत की हथियारों से सहायता की।इसके बाद 1999 के कारगिल युद्ध और 2025 के ऑपरेशन सिन्दूर में उसने भारत की हथियारों से भरपूर मदद की है और देश में शस्त्र निर्माण की परियोजना में सहयोग कर रहा है।इसके अलावा उससे भारत के घनिष्ठ और बड़े पैमाने पर व्यापारिक-आर्थिक सम्बन्ध हैं। ऐसे में ईरान के लिए भारत के लिए इजरायल के विरोध के क्या माने हैं? फिर इजरायल उस ईरान से जंग लड़ रहा है,जो उसके अस्तित्त्व को ही नाकारता आया है और उसका नामोनिशां मिटाने का इरादा ही नहीं,दुनिया से यहूदी कौम का ही खात्मा करना चाहता है।
भारत के मुसलमानों का रवैया बहुत विचित्र है कि वे चाहते हैं कि भारत सरकार की विदेश नीति या कहें दुनिया के उसके रिश्तों का निर्धारण राष्ट्रीय हितों के बजाय उनके मुताबिक/मजहबी फायदों के अनुसार हो।यही वजह उन्हें इजरायल पर हमास के दहशतगर्दों की दरिन्दगी दिखायी नहीं दी,उन्हें सिर्फ इजरायल का गाजा के फलस्तीनों का कत्ल-ए-आम नजर आया। ऐसे ही अब उन्हें ईरान का दहशतगर्द संगठनों की हिमायत,इमदाद और, उसके इजरायल का नामोनिशां मिटाने के इरादे में कुछ भी गलत दिखायी नहीं ,देता,क्यों कि यहूदी काफिर हैं,जिन्हें जीने का हक नहीं है। इन्हें बांग्लोदश में हिन्दुओं के उत्पीड़न,उन्हें जलाये जाने,मन्दिर तोड़ने जाने से कोई तकलीफ नहीं होती। ये लोग पाकिस्तान द्वारा रमजान के पवित्र माह में अफगानिस्तान के काबुल स्थित नशा मुक्ति केन्द्र पर बम बरसा कर 400लोगों को मार डालने पर ही कुछ नहीं बोलते और न ही पाकिस्तान में नमाज पढ़ते शियाओं की मस्जिद पर बम फेंक उन्हें मौत की नींद सुलाने पर,, क्यों कि अपने ने मारा, तो कोई बात नहीं।लेकिन गैर नहीं मारा,तो उसकी खैर नहीं। यही कारण जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में भाजपा के विधायक सुरजीत सिंह सलाथिया ने पूछा कि जब बांग्लादेश में हिन्दुओं को जलाया जा रहा था तब आप सदन में क्यों खामोश बैठे रहे थे? इसका उनके पास इसका कोई जवाब नहीं है और न होगा।ंफिलहाल, देश के लोगों का इनसे सवाल यह है कि एक ओर तो यह समुदाय संविधान और पंथनिरपेक्षता की दुहाई देता है,तो दूसरी ओर खुद शरीयत पर चलते हुए देश की विदेश नीति को भी इस्लामिक मुल्क के हितों के नजरिये से बनाना चाहते हैं। यह कोई और कह- सुन नहीं रहा ,यह अब तक का उनका रवैया साबित कर रहा है। वैसे क्या ऐसा किया जाना उनके और इस मुल्क के हित में होगा?यह सवाल उन्हें खुद से पूछना होगा।
सम्पर्क-डॉक्टर बचन सिंह सिकरवार वरिष्ठ पत्रकार, 63ब,गाँधी नगर,आगरा-2820003 मोबाइल नम्बर-9411684054

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