मनोरंजन

‘धुरन्धर -द रिवेंज’ की इतनी मुखालफत क्यों?

डॉ.बचन सिंह सिकरवार
हाल में प्रदर्शित फिल्म ‘धुरन्धर-द रिवेंज’ की विषय सामग्री/वस्तु, उसकी अपार लोकप्रियता, भारी सफलता और अप्रत्याशित कमाई को लेकर इसकी जो बहुत चर्चा हो रही है,वह तो ठीक है,पर इसके कथानक को लेकर गैर भाजपाई राजनीतिक दलों और कट्टरपंथी मुस्लिम नेता, मुल्ला, मौलवी मुखालफत/विरोध में आग उगलते हुए इसे प्रोपेगण्डा/मनगण्ढन्त कहानी/हिन्दू-मुसलमानों के रिश्ते खराब करने/नफरत फैलाने वाली, मुस्लिम विरोधी फिल्म साबित करने में लगे हैं, वह भी किसी दशा सही नहीं है। इस फिल्म के विरोधियों का आरोप है कि यह फिल्म केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा को हाल में कुछ राज्यों मेंहोेने जा रहे विधानसभा के चुनावों में फायदा पहुँचाने के इरादे/मकसद पहुँचाने को बनायी गई है। लेकिन सच यह है कि फिल्म ‘धुरन्धर’ के प्रथम भाग में ही ‘धुरन्धर-2’के 19मार्च,2026 को प्रदर्शित करने की घोषणा कर दी थी। इनके विपरीत भाजपा के नेताओं द्वारा ‘धुरन्धर-द रिवेंज’फिल्म को वास्तविकता दर्शाने वाली बताया जा रहा है। यहाँ प्रश्न यह है कि ‘धुरन्धर-द रिवंेज’ में भारतीय जासूस को पाकिस्तान के दहशतगर्दों को ढूँढ़-ढूँढ कर उनसे लड़ते और उनका खात्मा करते हुए दिखाया गया है। इसमें भारतीय मुसलमानों के खिलाफ कुछ भी नहीं है। फिर भी इस फिल्म को लेकर इतनी मुखालफत/ विरोध क्यों है?इसका जवाब यह है कि पाकिस्तान का इस्लामी मुल्क होना और उसके बाशिन्दों के हममजहबी और रिश्तेदार होने के चलते जहाँ अपने देश के कुछ मुसलमान उनसे बेहद हमदर्दी/मुहब्बत रखते और उन्हें अपना सगा-सम्बन्धी भी मानते हैं, तो वहीं गैर भाजपाई सियासी पार्टियों के नेता इन मुसलमानों की इस कमजोरी का फायदा उठाने के इरादे से इस धुरन्धर-द रिवेंज’ फिल्म का ही नहीं, देश में कहीं भी उनके हर गुनाह की अनदेखी/सही ठहराते आए हैं। चाहे जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी हिन्दुओं का नरसंहार, या फिर देश में कहीं भी हुई ‘लव जिहाद’ की घटनाएँ या फिर साम्प्रदायिक दंगा में उनकी दरिन्दगी हो। ऐसा धतकरम ये नेता मुसलमानों के वोट हासिल करने की खातिर करते आए हैं।
ं वैसे ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। ये विपक्षी सियासी पार्टियाँ, कट्टरपंथी मुस्लिम नेता जम्मू-कश्मीर में नब्बे के दशक में जिहादियों, अलगाववादियों द्वारा कश्मीरी हिन्दुओं/पण्डितों के नरसंहार, युवतियों के साथ बलात्कार,उन्हें बन्दूक के जोर पर पलायन को मजबूर करने की हकीकत को बयां करने वाली फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’, केरल में हिन्दू युवतियों के धर्मान्तरण का दर्शाने वाली ‘ द केरल स्टोरी’, आजादी से पहले बंगाल के ‘नोखाआली’में हिन्दुओं के ‘कत्ले-ए-आम’ को दिखाने वाली ‘ द बंगाल फाइल्स’, हाल में रिलीज हुई लव जिहादी पर आधारित ‘द केरल स्टोरी-2’ को भी प्रोपेगण्डा फिल्म/मिथ्या तथ्यों पर बनी और मुसलमानों को बदनाम करने वाली फिल्म बताते हुए विरोध कर चुके हैं। वस्तुतः ये सभी फिल्में यथार्थ/सत्य तथ्यों पर आधारित हैं,लेकिन इससे तथाकथित सेक्यूलर सियासी पार्टियों और मुसलमानों के नेताओं की बौखलाहट और उनका परेशान होना स्वाभाविक है, क्योंकि इनसे देश के लोगों के समक्ष इनकी जो असलियत सामने आ गई है,जिसे वे अब तक अपनी सत्ता की खातिर छुपाते आ रहे हैं। वैसे तो विपक्षी राजनीतिक दलों को पूरी ‘धुरन्धर-द रिवंेज’फिल्म पर ही आपत्ति है। लेकिन इन सभी को सबसे ज्यादा आपत्ति गैंगस्टर से नेता बने अतीक अहमद(आतिफ अहमद )के चरित्र/किरदार को लेकर है,जिसका पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था ‘आइ.एस.आइ.से रिश्ता तथा उसकी देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्तता दिखाया जाना है। समाजवादी पार्टी के इस नेता को पुलिस हिरासत में पत्रकार के रूप आए हत्यारों ने गोलियों की बौछार कर मार डाला था। वैसे अतीक अहमद के सम्बन्ध पाकिस्तान की गुप्तचर एजेन्सी से रिश्ते थे और वहाँ से धन और हथियार भी प्राप्त करता था, पर सपा, काँग्रेस आदि पार्टियाँ उसके गुनाहों पर पर्दा डालते आए हैं। अब फिल्म ‘धुरन्धर-द रिवेंज’ में उसकी असलियत देखकर सपा कुछ ज्यादा ही बौखलाई हुई है,क्योंकि मुसलमानों का एक वर्ग उसे अपना मसीहा/रोबिनहुड मानता था।ऐसे में सपा को उम्मीद है कि उनके विरोध से मुसलमान उनकी पार्टी को अपना वोट जरूर देंगे। यही कारण है कि काँग्रेस के पूर्व सांसद उदित राज द्वारा इस फिल्म को भाजपा और आर.एस.एस.की प्रोपेगण्डा बताया जा रहा है।
इनके प्रत्युत्तर में उ.प्र.के मंत्री ओमप्रकाश राजभर का कहना है कि फिल्में सरकार नहीं,बल्कि फिल्ममेकर बनते हैं। फिल्में बनाने वाले वहीं दिखाते हैं,जो उन्हें लगता है कि दर्शकों को पसन्द आए और फिल्म सफल हो। भाजपा के वरिष्ठ नेता रामकृपाल यादव ने भी फिल्म का सपोर्ट करते हुए कहा कि फिल्में समाज में होने वाली घटनाओं को ही दर्शाती हैं और लोगों के सामने सच्चे रखने का काम करती हैं। मैंने अतीक अहमद को संसद के समय से जानता था और उन्हें करीब से देखा है। अगर फिल्म में उनकी कहानी दिखायी जा रही है,तो इसमें कोई गलत बात नहीं है।
उधर समाजवादी पार्टी के महाराष्ट्र के विधायक आबू आजमी ने आरोप लगाया है कि ‘धुरन्धर -द रिवेंज’फिल्म मुसलमानों को बदनाम करने के लिए बनायी गयी है। इसी पार्टी के अयोध्या से सांसद अवधेश प्रसाद ने कहा कि भाजपा जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। समाजवादी पार्टी के नेता राजीव राय ने फिल्म’ धुरन्धर-2’ की आलोचना करते हुए इसे भाजपा का प्रोपेगण्डा कहा है। उन्होंने आरोप लगाया भाजपा ऐसी फिल्में के जरिए खास छवि बनाने की कोशिश कर रही है,वहीं एमआईएमआई के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने कहा,कुछ लोग ऐसे भी है जो पैसे कमाने के लिए इस तरह की प्रोपेगण्डा फिल्म बनाते हैं। ऐसी फिल्में माहौल खराब करने के लिए बनायी जाती हैं।’’ ऐसे में काँग्रेस सांसद इमरान मसूद भला क्यों पीछे रहते। उन्होंने फिल्म को बकवास बताते हुए नाकारा कहा। इस फिल्म का कन्टेंट/विषय सामग्री पर सवाल उठाए हैं। अब फिल्म ‘धुरन्धर -द रिवेंज’‘को लेकर पैदा विवाद पर जम्मू-कश्मीर के पूर्व पुलिस महानिदेशक शेष पॉल वैद्य(एस.पी.वैद्य) का कहना है कि जब तक दाऊद इब्राहिम के पैसों से फिल्में बनने के आरोप लगते रहे हैं, तब तक किसी को खास आपत्ति नहीं हुई। लेकिन अब जब उसी दाऊद इब्राहिम पर आधारित पर बनायी जा रही है,तो कुछ लोगों को अचानक असहज महसूस होेने लगी है। फिल्म ‘धुरन्धर-द रिवेंज’में सरकार का पैसा नहीं, बल्कि निर्देशक आदित्य धर का निजी निवेश है। यदि इसमें दिखाए गए तथ्य वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है, तो इस पर आपत्ति किसी बात की? जहाँ तक दाऊद इब्राहिम और अतीक अहमद जैसे व्यक्तियों पर सवाल है,उनके आपराधिक इतिहास किसी से छिपे नहीं है? अब जहाँ तक विपक्षी राजनीति दलों और मुसलमानों के नेताओं, मुल्लाओं,मौलवियों द्वारा ‘द कश्मीर फाइल्स’, द केरल स्टोरी,‘द बंगाल फाइल्स’,‘धुरन्धर’,धुरन्धर-द रिवेंज आदि फिल्मों को भाजपा/आर.एस.एस. की प्रोपेगण्डा फिल्में बताने की बात है,तो ये सभी सत्य तथ्यों पर आधारित है,इनमें क्रमशः जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम जिहादियों,अलगाववादियों के हिन्दुओं के नरसंहार, केरल मेें गैर हिन्दू युवतियों को बहला फुसला उनका मतान्तरण करने,उन्हें आइ.एस.जैसे अन्तरराष्ट्रीय दहशतगर्द संगठन को भेजने, आजादी से पहले बंगाल में मुहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्ट ऐक्शन के ऐलान पर हिन्दुओं की बड़े पैमाने पर कत्ल-ए-आम, धुरन्धर फिल्म के दोनों भागों में इस्लामिक/पाकिस्तानी दहशतगर्दों के भारत विरोधी गतिविधियों और उन्हें रोकने तथा संहार करने में भारतीय जासूसों के कारनामों को दर्शाया गया। इनमें कोई अतिश्योक्ति नहीं दिखायी गई है।अब उक्त फिल्मों को प्रोपेगण्डा या मुसलमान विरोधी तथा उन्हें बदनाम करने वाली फिल्में बनाने के आरोप लगाने काँग्रेसी,सपा,वामदलों के नेताओं, बुद्धिजीवियों के दुहरे रवैये को भी जान लेते हैं। सन् 1942 में कहानीकार इस्मत चुगताई ने समलैंगिग महिला सम्बन्ध को लेकर ‘लिहाफ’शीर्षक से कहानी लिखी थी।इस पर 1996 में दीपा मेहता ने ‘द फायर’ शीर्षक अभिनेत्री शबाना आजमी और नीतादास को लेकर फिल्म बनायी,जिसमें बेगम जान और रब्बो के पात्रों के मुस्लिम नाम बदल कर सीता तथा राधा जैसे हिन्दू नाम कर दिये,जब कि ये देवियों के नाम हैं।ऐसा करते हुए उन्हें हिन्दुओं की भावनाओं के आहत होने का ख्याल नहीं आया। जब इसका विरोध हुआ,तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार कह उनका मुँह बन्द करा दिया गया। ऐसे ही फिल्म ‘ चक दे इण्डिया’ की कहानी हाकी खेल के कोच मीर रंजन नेगी के जीवन आधारित है,पर इसके कोच का धर्म बदल कर मुसलमान बना दिया। इस तरह ‘ओ माई गाड’, पीके, धर्म काँटा आदि फिल्मों में हिन्दू धर्म और देवताओं का जमकर मजाक उड़ाया गया, पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार कह कर बचाव किया। अब जब फिल्म ‘धुरन्धर द रिवेंज’ में मुसलमानों वह भी पाकिस्तान के मुसलमानों का,तब भी कोहराम मचाया जा रहा है। वैसे ऐसा करने भूल रहे हैं,उन्हें यह सब करने से मुसलमानों के वोट मिलें या न मिलें, पर उनके हिन्दू वोट जरूर कम हो जाएँगे। यह सब ये लोग याद रखें कि वे सिर्फ सियासत नहीं कर रहे हैं,बल्कि अपने मुल्क और उसके बाशिन्दों के हितों से गद्दारी भी कर रहे हैं,जिसके लिए देश उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।
सम्पर्क-डॉक्टर बचन सिंह सिकरवार वरिष्ठ पत्रकार, 63ब,गाँधी नगर,आगरा-2820003 मोबाइल नम्बर-9411684054

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