राजनीति

सत्ता के लिए अन्ध हिन्दू विरोध

 

डॉ.बचन सिंह सिकरवार

गत दिनों विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा मद्रास हाई कोर्ट न्यायाधीश जी.आर.स्वामीनाथन के मदुरै के स्थित अरुलमिगु सुब्रह्मणयम स्वामी मन्दिर के दीपम स्तम्भ पर धार्मिक परम्परा ‘कार्तिगई’ उत्सव पर दीप जलाने को लेकर दिये दोनों आदेश और उनकी अवमानना,फिर इन सभी आदेशों के खिलाफ न केवल सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है,बल्कि इन न्यायाधीश पर धार्मिक पक्षपात और एक विशेश विचारधारा से प्रेरित होकर निर्णय करने का आरोप लगाते हुए महाभियोग चलाने की प्रक्रिया शुरू करने की जो माँग की है,इससे इन विपक्षी राजनीतिक दलों के नेताओं की नीति और नीयत दोनों पर प्रश्न चिह्न लगाता है। ऐसा लगता है कि ये दल अपनी चुनावी विफलताओं से क्षुब्ध होकर विवेकशून्य हो गए हैं। इनके नेताओं को अपनी राजनीतिक नीतियों-सिद्धान्तों, जनभावना, जनता की मूल समस्याओं,  स्वयं के आचरण, संगठनात्मक की कमियाँ-खामियाँ पर गहन चिन्तन-मनन, आत्म मन्थन कर अपनी अलोकप्रियता तथा चुनाव में हार के कारणों को दूर करने के स्थान पर अब हर संवैधानिक संस्थाओं को दोशी ठहराने पर उतर आए हैं। ये दल एक ओर तो केन्द्र में सत्तारूढ़ राजग विशेश रूप से भाजपा पर संविधान की अवमानना या उसका उल्लंघन, उसे नश्ट करने, तानाशाही रवैये से लोकतंत्र को कमजोर  करने का दोशी ठहराते आए हैं, वहीं दूसरे ओर ये लोग संवैधानिक संस्थाओं पर एक से एक गम्भीर आरोप लगाते हुए उनके संचालकों को खुले आम डराने-धमका रहे हैं। अपने देश की राजनीति की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि एक ओर तो पंथनिरपेक्ष/सेक्यूलर होने का दिखावा करने वाले  विरोधी राजनीतिक दल हर मामले में  अल्पसंख्यक तुश्टीकरण की नीति अपनाते आए हैं और जब उसकी इस नीति के विरुद्ध भाजपा आवाज उठाती है तो उल्टे उस पर ही लगातार साम्प्रदायिक होने के आरोप लगाते आए हैं।सच्चाई यह है कि कथित पंथनिरपेक्ष सियासी पार्टियाँ अल्पसंख्यक  को खुश करने का मौका नहीं छोड़तीं, फिर भी बेशर्मी से खुद को पंथनिरपेक्ष  कहते नहीं थकतीं। इनके इस दुहरे चाल-चरित्र को समझने के लिए मदुरै के तिरुपरन कुण्ड्रम का दीपम स्तम्भ पर दीप जलाने को लेकर उत्पन्न विवाद से भली भाँति समझा-परखा जा सकता है। वर्तमान में तमिलनाडु में सत्तारूढ़ ‘द्रविड़ मुनेत्र कशघम’(डीएमके) की अगुवाई में दूसरी विपक्षी सियासी पार्टियाँ उनकी ही तुश्टीकरण की खातिर तमिलनाडु के मदुरै के ‘अरुलमिगु’ मन्दिर के दीप स्तम्भ पर दीप जलाने को लेकर उत्पन्न विवाद में पहले भाजपा पर आरोप लगाने के बाद अब मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जी.आर.स्वामिनाथन के खिलाफ महाभियोग चलाने की माँग कर रही हैं,जिन्होंने मन्दिर का ऐतिहासिक पक्ष दीपम स्तम्भ दीप जलाने का निर्णय दिया। वैसे अब ये राजनीतिक दल  सत्ता पाने के लिए लोगों को कितना भी भरमाएँ,पर सच यह है कि उक्त मुद्दे पर मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जी.आर.स्वामीनाथन ने जो निर्णय दिया है ,वह  सर्वथा ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित और न्याय सम्मत है।इस साहसिक न्याय निर्णय के लिए उनकी जितना प्रशंसा की जाए,वह कम ही होगी। लेकिन सत्ता पाने के लिए कुछ कर गुजर जाने वाले सियासी नेताओं को इससे कोई मतलब नहीं है,उनके लिए वह ही सही है,जिससे उनका वोट बैंक मजबूत होता हो।इसी मुद्दे पर लोकसभा में शून्यकाल के दौरान भाजपा सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने द्रमुक सरकार पर यह सही आरोप लगाया कि तमिलनाडु सरकार सनातन विरोध का प्रतीक बन गई है और राज्य में हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार हो रहा है। उनके इस आरोप में दम है कि उसे मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं की तो चिन्ता है,पर सदियों से अपने मन्दिर की भूमि पर बने दीपम स्तम्भ पर सरकारी रोक की वजह है दीप जलाने की अपनी परम्परा तक नहीं निभा पा रहे हैं,क्या इससे हिन्दुओं के मन में क्षोभ उत्पन्न नहीं होता? इससे सरकार को कोई सरोकार नहीं है। यह हिन्दुओं के साथ भेदभाव नहीं,तो क्या है?

वर्तमान मदुरै के अरुलमिगु मन्दिर के दीपम स्तम्भ(दीपाथून-एक प्राचीन पत्थर का स्तम्भ) पर दीप जलाने के विवाद को गहनता से समझने हेतु पूर्ण प्रकरण का ज्ञान होना आवश्यक है। तमिलनाडु में यह 10 द्विदिवसीय महोत्सव अगहन मास की पूर्णिमा से शुरु होता है। इस अवसर पर मन्दिरों और धार्मिक स्थलों पर दीप जलाए जाते हैं और सजावट की जाती है। इसे अन्धकार पर प्रकाश और अज्ञानता पर ज्ञान की जीत बताया जाता है। इस वर्श वह महोत्सव 4दिसम्बर की रात्रि से प्रारम्भ हुआ है। अँग्रेजी महीनों से देखें तो यह त्योहार हर साल मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर के मध्य सम्पन्न होता है।

मदुरै के तिरुपरनकुण्ड्रम इलाके में पहाड़ी पर स्थित अरुलमिगु सुब्रह्मणयम स्वामी मन्दिर   छह मन्दिरों में से पहला स्थान है। 300 ईस्वी पूर्व से 300 ईस्वी के दौरान लिखे गए संगम साहित्य में भी यहाँ भगवान मुरूगन की पूजा का उल्लेख है। इस मन्दिर के बाहर पत्थर का दीप स्तम्भ है,इस पर हर वर्श कार्तिगई दीपम जलाने की परम्परा है। सन् 1931 में प्रिवी कौंसिल के फैसले में दरगाह और सीढ़ियों को छोड़ पूरी पहाड़ी को मन्दिर का हिस्सा बताया जा चुका है। वैसे यह पहाड़ी सदियों से साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है, जहाँ एक ही स्थान पर हिन्दू, सूफी दरगाह और प्राचीन जैन गुफाएँ हैं। विगत कोई100सालों से दीप पहाड़ी के निचले हिस्से मेंं ‘उच्चि पिल्लयार’ मन्दिर के निकट जलाया जाता रहा है। दीपम स्तम्भ पर दीप जलाने की बढ़ती आशंका को देखते हुए पुरातत्त्व विभाग ने इस विवादित स्तम्भ की जाँच कर रहा है,जिससे यह स्पश्ट हो सके कि वह ‘प्राचीन दीपाथून’ है या फिर कोई सर्वे का पत्थर

मद्रास उच्च न्यायालय की एकल पीठ के न्यायाधीश स्वामीनाथन ने एक दिसम्बर को आदेश दिया था कि अरुलमिगु मन्दिर प्रशासन दीप अवश्य जलाए,क्योंकि वह स्थान मन्दिर भूमि पर है और दरगाह परिसर से बाहर है। इस आदेश से दरगाह या मुस्लिम समुदाय के अधिकारों का हनन नहीं होगा। वहीं  प्रशासन का तर्क था कि यह ‘दीपम स्तम्भ’ पहाड़ी को चोटी पर स्थित सिकन्दर बादशाह की दरगाह के अत्यन्त निकट है, इस कारण राज्य सरकार अनुमति नहीं दे रही है,क्यां कि इससे साम्प्रदायिक तनाव पैदा होने का डर  है। लेकिन जब मद्रास उच्च न्यायालय के इस आदेश अनुपालन  नहीं किया गया,तो न्यायाधीश स्वामीनाथन ने तीन दिसम्बर को एक और आदेश देकर श्रद्धालुओं को स्वयं दीप जलाने की अनुमति दे दी। हाईकोर्ट में आदेश की अवमानना की प्रक्रिया शुरू कर दी उच्च न्यायालय ने राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक,मदुरै के जिलाधिकारी,पुलिस उपायुक्त को न्यायालय में स्वयं उपस्थित होकर अवमानना का उत्तर देने को कहा है। राज्य सरकार साप्रदायिक सद्भाव का हवाला देते हुए मद्रास उच्च न्यायालय आदेश पर रोक लगाने की माँग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में पहुँच गयी ,लेकिन फिलहाल उसे राहत नहीं मिली है।

विधानसभा चुनाव के पहले मदुरै स्थित अरुलमिगु सुब्रह्मणयम स्वामी मन्दिर में दीप जलाने के मुद्दे पर तमिलनाडु की राजनीति गरमा की गई है और राजनीतिक बहस जारी है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद दीप स्तम्भ पर कार्तिक महीने के दीये जलाने पर भाजपा और अन्य हिन्दू संगठन अड़ गए हैं। भारतीय जनता पार्टी राज्य सरकार पर हिन्दू विरोधी होने का आरोप लगा रही है।उसके मंत्री उदयनिधि सनातना(हिन्दू) धर्म को कोरोना,डेंगू,मलेरिया वायरस से भी अधिक घातक और नश्ट करने बात कह चुके हैं, वहीं, तमिलनाडु की सरकार इसे रोकने में पूरी ताक झोंक दी है और इस कानून-व्यवस्था बनाये रखने का मसला बता रही है। 4दिसम्बर को इसी मुद्दे पर हिन्दू संगठनों और पुलिस के बीच कई झड़पें हुईं हैं,जिसमें कुछ लोग घायल भी हुए हैं। इसके बाद मदुरै में  धारा 163पूर्व में 144लागू करने के साथ भारी पुलिस बल तैनात किया गया है। तमिलनाडु भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अन्नामलाई ने इसे ‘दक्षिण की अयोध्या’ करार दिया है।

तमिलनाडु में मन्दिर-दरगाह विवाद से उठी राजनीतिक गर्मी अब संसद तक पहुँच गई है। द्रमुक की अगुवाई से विपक्षी सदस्यों ने मद्रास हाईकोर्ट के जज जी.आर.स्वामीनाथन को हटाने की माँग करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को महाभियोग का नोटिस सौंपा है। प्रस्ताव पर 120सदस्यों के हस्ताक्षर हैं,जिनमें द्रमुक, समाजवादी पार्टी,काँग्रेस सहित कई दलों के नेता शामिल हैं। द्रमुक सदस्य कनिमोरी, टी.आर.बालू ,सपा प्रमुख अखिलेश यादव और काँग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा ने विशेश रूप से लोक सभा अध्यक्ष से मिलकर यह नोटिस सौंपा। सदस्यों ने अनुच्छेद -124 और 217 का हवाला दे आरोप लगाया कि जज का आचरण  पारदर्शिता के मानकों पर खरा नहीं उतरता। आरोप  है कि उन्होंने एक विरोश  समुदाय के कुछ वकीलों का पक्ष लिया व उनके कुछ फैसले राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित थे। पंथनिरपेक्ष भावना के विरुद्ध हैं। नोटिस के साथ राश्ट्रपति  और प्रधान न्यायाधीश  को भेजे गए पत्रों की प्रति संलग्न की गई हैं।

इस बीच इसी मुद्दे पर राश्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(आर.एस.एस.)के सर संघचालक डॉ. मोहन भागवत का  यह कहना है कि इस विवाद का राज्य(तमिलनाडु) के हिन्दुओं की एकजुट शक्ति और सामर्थ्य के आधार पर सुलझाया  जा सकता है।तिरुपरन कुण्ड्रम मुद्दा  अगर आगे बढ़ाने की जरूरत पड़ी,तो बढ़ाया जाएगा। फिलहाल, यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है,इसलिए इसे वहीं शान्तिपूर्वक हल होने दिया जाए। उनके इस बयान को मदुरै दीपम विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है,वहीं धार्मिक आयोजन को लेकर हाल के दिनों में तनाव बना हुआ है।

उपर्युक्त प्रकरण से स्पश्ट है कि गैर भाजपाई विपक्षी दल और उनकी सरकारें देश के स्वतंत्र होने के बाद से ही  अल्पसंख्यक तुश्टीकरण नीति के तहत वैध-अवैध,उचित-अनुचित तरीके से हिन्दू हितों  की अनदेखी,उपेक्षा और उनके साथ हर तरह का अन्याय,उत्पीड़न करती आयी हैं। यहाँ प्रश्न यह है कि जब दीपम स्तम्भ मन्दिर की भूमि पर बना है,तो इसमें मुसलमानों को आपत्ति क्यों होनी चाहिए?फिर हिन्दुओं के छह मन्दिर हैं,जो दुनिया में इस्लाम के उद्भाव से हजारों साल पुराने हैं,तो यहाँ दरगाह क्यों और कैसे बन गई?यदि बन गई,तो उसकी वजह से हिन्दू अपनी परम्परा का परित्याग क्यों करें?  साम्प्रदायिक सद्भाव बनाये रखने का दायित्व क्या सिर्फ हिन्दू ही निभाये? डीएमके सरकार का यह नहीं दायित्व है कि बिना किसी भय के हिन्दुओं को अपने उपासना स्थल पर पूजा-अर्चना करने के लिए सुरक्षा प्रदान करे,जो साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिश करे,उनसे सख्ती से निपटे। लेकिन वह कर इसका उलटा रही है। वैसे भी उसे सत्ता के लिए  हिन्दू ही नहीं,कभी राश्ट्रीय हितों के विरुद्ध कार्य करने से गुरेज नहीं है।  द्रमुक की उत्पत्ति ही ब्राह्मण/हिन्दू विरोध के आधार हुई और इससे वह पोशण पाती है।डीएमके का साथ देने वाली काँग्रेस,सपा आदि भी इस पाप में बराबर की भागीदार हैं।वैसे भी यही पाप ये सभी श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर/बाबरी मस्जिद विवाद में कर चुकी हैं। लेकिन  अब देखना यह है कि सर्वोच्च न्यायालय,लोकसभा और कालान्तर में राज्य की जनता द्रमुक सरकार की इस अनीति के लिए किसी तरह से दण्डित करती है।

सम्पर्क-डॉक्टर बचन सिंह सिकरवार वरिश्ठ पत्रकार, 63ब,गाँधी नगर,आगरा-2820003 मोबाइल नम्बर-9411684054

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