-डाॅ.बचन सिंह सिकरवार
गत दिनों दिल्ली के लाल किले के पास कार विस्फोट मामले में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल काॅन्फ्रेंस के अध्यक्ष डाॅ.शेख अब्दुल्ला,उनके बेटे तथा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला,इसी सूबे की पूर्व मुख्यमंत्री एवं पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती के काँग्रेस के पूर्व सांसद हुसैन दलवी, पूर्व केन्द्रीय पी.चिदम्बरम समेत कुछ मुस्लिम राजनेता बम विस्फोटों से देश को दहलाने की षड्यंत्र करने तथा बम धमका कर एक दर्जन से अधिक निर्दोष लोगों की जान लेने और दो कोई दर्जनों को घायल करने वाले डाॅ.उमर नबी बट को हत्यारा बता कर उसकी हैवानियत की मजम्मत/ निन्दा-आलोचना करने के बजाय उसके इस राक्षसी कृत्य को अलग-अलग तुर्कों-कुतर्कों से उचित/जायज ठहराने में जुटे हैं, इतना ही नहीं, उसे जुल्म के खिलाफ लड़ने वाला साबित कर हमदर्दी जताने की कोशिश कर रहे हैं। वैसे इन लोगों का इस्लामिक दहशतगर्दों/जिहादियों को लेकर इनका यह रवैया नया नहीं है। ये सब भी उन लोगों में से एक हैं, जो ऐसे युवाओं को दहशतगर्द नहीं, ‘मुजाहिद’(धर्मरक्षक/प्रचारक) मानते/समझते हंै, जो उनकी इस सूबे को ही नहीं, दुनियाभर मे ‘निजाम-ए-मुस्तफा’/दारुल इस्लाम के लिए काम कर/खुद को कुर्बान कर रहे हैं।इस कारण अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार के लोग पत्थरबाजों/इस्लामिक कट्टरपंथियों को बेचारा/राह भुला बताकर बचाव करते आए हैं।
दरअसल, अपने देश में नेता हों या जनसंचार माध्यम से सम्बन्धित लोग भय या निजी स्वार्थवश सत्य कहने/लिखने से बचते आए हैं, तभी तो आतंकवादी/दहशतगर्द और जिहादी में फर्क करने से बचते आए हंै। हकीकत यह है कि आतंकवादी/दहशतगर्द वह होता है जो खून-खराबे-हिंसा से आतंक/दहशत फैलाकर लोगों या शासन-सत्ता से अपने गलत/सही मकसद /माँग को पूरा कराते हैं,जबकि यही सब खास मजहबी मकसद को पूरा करने को किया जाता है तो जिहाद और उसे अंजाम देने वाला जिहादी। लेकिन हकीकत से पर्देदारी में जुटे लोग जिहाद का कुछ दूसरा मतलब बता कर लोगों को गुमराह करते आए हैं, वे लोग भी सत्ता के लोभ सब जानकर ही उनके कहे झू ठपर हामी भरते रहे हैं।
अब जहाँ तक बम विस्फोट कर देशभर में तबाही मचाने की साािजश करने वाले डाॅक्टरों के कट्टरपंथी बनने को लेकर पूछे गए सवाल पर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा,‘‘मुझे नहीं पता,कुछ(दहशतगर्द)सोचते हैं कि सरकार ने उनके साथ बेइन्साफी/अन्याय किया है,कुछ मजहब की वजह से, कुछ इसलिए ,क्यों कि उन्हें अपने भविष्य की कोई उम्मीद नहीं दिखती।’’ उनके इस बयान से यही साबित होता है कि देश में तबाही मचाने की साजिश में लगे डाॅक्टरों के साथ सरकार अन्याय और जुल्म कर रही है,अगर ऐसा है तो जम्मू-कश्मीर में आजादी के बाद से उनके हममजहबी/मुसलमान ही शासक रहे हैं,जिनमें उनके पितामह शेख अब्दुल्ला,उनके पिता डाॅ.फारूक अब्दुल्ला और अब खुद भी दूसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं,कुछ समय उनके रिश्तेदार भी सत्ता में रह चुके हैं।फिर जनाब, कश्मीरी पण्डितों पर अपने हममहबियों की जुल्मों और उनकी दरिन्दगी के बारे मेंचर्चा कर लें,जब उनके अब्दुल्ला पिता-पुत्र की हुकूमत कत्ल-ए-आम और लाखों की संख्या में उन्हें घर-द्वार छोड़ने को मजबूर होना पड़ा था। फिर बड़ी बेहयाई खुद को सेक्युलर और संविधान मानने वाला बताते थकते नहीं हैं।
ये सभी डाॅक्टर अच्छे खाते-पीते परिवारों से हैं। फिर यदि इनके के साथ गैर इन्साफी हुई होती,तो क्या वे डाॅक्टर जैसी शिक्षा ग्रहण कर पाते,जिस पर दो करोड़ रुपए से अधिक सरकार खर्च करती है? अब भी ये डेढ़ से दो लाख रुपए वेतन पा रहे थे। फिर भी इन्हें अपने भविष्य को लेकर आशंका क्यों थी?क्या इस प्रश्न का उत्तर उमर अब्दुल्ला देंगे? वहीं, श्रीनगर में एक बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने केन्द्र सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि सरकार दावा करती है कि कश्मीर में सब कुछ ठीक है, लेकिन कश्मीर की समस्याएँ दिल्ली तक पहुँच गईं। उन्होंने कहा कि अगर एक पढ़ा-लिखा युवा आरडीएक्स बाँधकर खुद को और दूसरों को मार देता है तो इसका मतलब है कि देश में सुरक्षा व्यवस्था कमजोर हो रही है।’’उनके इस सवाल का जवाब यह है कि सूबे में तो सब ठीक है,पर महबूबा मुफ्ती और इनके जैसे कुछ हममजहबी जिनमें डाॅक्टर भी शामिल हैं जिनकी चाहत/उम्मीद के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में ‘निजाम-ए-मुस्तफा’या फिर इस सूबे के पाकिस्तान में शामिल करने के इनका ख्वाब का अनुच्छेद 370 और 35ए निरस्त होने के बाद जरूर टूट गया है। इसकी वजह से अब ये शिक्षित-प्रशिक्षित डाॅक्टर और दूसरे लोग खुलकर जिहाद के जरिए अपने ख्वाब को हकीकत में तब्दील करना चाहते हैं, जो अब नामुकिन है।इनके ख्वाब को तोड़ने की केन्द्र सरकार ने जरूर खता की है। वैसे अगर इन नौजवान को गुमराह करने का कोई गुनाहगार है, तो वे कश्मीर घाटी के मुस्लिम नेता,मुल्ला-मौलवी और उनके संस्थान हैं जहाँ से नौजवान हैवान बन कर बेकसूर लोगों की जान लेने और अपने मुल्क को बर्बाद करने को मजहबी फर्ज ने तालीम पाते हैं। अब जहाँ तक महबूबा मुफ्ती द्वारा सरकार पर सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाने की बात है तो इसमें कुछ खामी जरूर हंै,पर इसमें उनके हममजहबियों की कोई खता नहीं है?जो इस मुल्क को दारूल इस्लाम तब्दील करने को कुछ भी कर गुजरने और वह और दूसरे लोग उनका बचाव/कवर फायर देने को तैयार बैठे हैं?
अब आते हैं पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ.फारूक अब्दुल्ला के बयान पर जिन्होंने बेशर्मी से कहा,‘‘ आज हर कश्मीरी पर अंगुली उठाई जा रही है। हम कब तक इसका जवाब देते रहेंगे?’’जनाब ,अगर गुनाहगार को गुनाहगार नहीं कहेंगे,तो किसे कहेंगे? दिल्ली बम धमके के गुनाहगारों की टोली में ज्यादातर कश्मीर घाटी के डाॅक्टर,इमाम,मौलवी-मौलाना और दूसरे पेशे के लोग ही तो हैं?वह भी एक ही मजहब के।ऐसे में हर कश्मीर पर तो न सही,पर कश्मीर का नाम तो आएगा ही।
ऐसे मुद्दे में भला पंथनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक समुदाय की सबसे हमदर्द और पैरोकार काँग्रेस के नेता कैसे पीछे रहते ?इसलिए इस पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केन्द्रीय वित्तमंत्री पी.चिदम्बरम को कुछ नहीं सूझा तो यह कह करते हुए इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान के बचाव में आ गए है कि पहलगाम और दिल्ली के लाल किले पर हमले करने वाले ‘घरेलू ’आतंकवादी हैं,ेताकि अपने मुल्क के मुसलमानोें का खुश किया जा सके।ऐसा करने के पीछे चिदम्बरम की मंशा यह थी कि भारत कहीं दिल्ली धमाके के लिए पाकिस्तान का हाथ बताकर ‘आॅपरेशन सिन्दूर’की तरह हमला न कर दे। फिर पी.चिदम्बरम के नक्शे कदम पर चलते काँग्रेस के पूर्व सांसद हुसैन दलवी भी कश्मीर के जिहादी डाॅक्टर की हिमायत और बचाव करने में पीछे नहीं रहे।उन्होंने कहा,‘‘यह धमका कश्मीर में हो रही, गैर इन्साफी का नतीजा हो सकता है। यदि ऐसा है तो जम्मू-कश्मीर में ज्यादातर समय उनकी पार्टी और उनकी सहयोगी पार्टियों की ही हुकूमत रही है।फिर भी अगर कहीं कुछ गलत हो रहा है,तो उनकी पार्टी खामोश क्यों हैं,जो वहाँ के युवाओं को बम धमका करने की नौबात आ गई?क्या वह बतायेंगे कि जम्मू-कश्मीर कोई पाँच लाख हिन्दुओं को उनके मजहब के दरिन्दों ने बन्दूक की नौंक पर पलावन को विवश किया। तब हजारों हिन्दुओं का कत्ल करने के साथ बड़ी संख्या में महिलाओं से बलात्कार किया। उनके घरों का आग के हवाले किया।क्या किसी हिन्दू ने दहशतगर्द बनकर अब तक किसी मुसलमान जान ली? क्या किसी मुख्यमंत्री ने उन जालिमों को सजा दिलाने की कोशिश की? उन्होंने यह सवाल भाी किया कि चुनाव के समय ही विस्फोट क्यों होते हैं?तो इसका जवाब सरकार से नहीं ,उन्हें अपने हममजहबियों से पूछना चाहिए,जिनका पाकिस्तान के जिहादियों से गहरा नाता/रिश्ता है। इतना ही नहीं,हुसैन दलवी ने कहा कि दिल्ली विस्फोट में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ( आर.एस.एस. )की भूमिका की जाँच होनी चाहिए, तो जनाब जिनकी जाँच होनी चाहिए, उनकी ही हो रही है। उनका यह कहना सर्वथा अनुचित है कि आर.एस.एस के कुछ गुट आतंकवाद का समर्थन कर सकते हैं और इसी वजह से लोगों के साथ अन्याय होता। आर.एस.एस. ने कभी भी आतंकवाद की हिमायत नहीं की।इसके अलावा पूर्व सांसद हुसैन दलवई ने चिदम्बर के इस सिद्धान्त की जाँच की माँग की कि विस्फोट एक आन्तरिक मुद्दा था जिसमें आन्तरिक आतंकवाद शामिल था। ठीक कहा अपने, देर-सबेर जाँच में दिल्ली बम धमाके में पाकिस्तान में बैठे जिहादियों को हाथ जरूर सामने आएगा। इन्हीं की तरह कर्नाटक के एक काँग्रेस के नेता ने जिहादियों के बचाव के इरादे से यह आरोप लगाया कि बिहार के पहले चरण में एनडीए की खराब हालत देखते हुए दूसरे चरण से ठीक एक दिन पहले दिल्ली में धमका किया गया।अगर ऐसा तो एनडीए को 2002 सीटें कैसे मिल गई?जबकि दूसरे चरण में केवल 122सीटों पर ही चुनाव हुआ था। इन सभी मुस्लिम और गैर मुस्लिम नेताओं द्वारा दिल्ली के बम धमाके और इस जिहादी गिरोह के बचाव में बयान से स्पष्ट है कि वे जानबूझकर उनके असल मकसद/हकीकत की पर्देदारी कर रहे हैं,ऐसा कर पर वे खुद को पूरे मुल्क के लोगों को धोखा देते आए हैं और अब भी देने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।यह सब कर वह रही-सही विश्वासनीय को खो रहे हैं। देरसबेर देश के लोग ऐसे वतनफरोशों को सजा दिलाने को जरूर आगे आएँगे। वैसे जब तक जिहादी बनने के असल कारणोें की पड़ताल कर उनके निराकरण नहीं होगा,तब तक जिहादी मानसिकता अन्त सम्भव नहीं है।
सम्पर्क-डाॅक्टर बचन सिंह सिकरवार वरिष्ठ पत्रकार, 63ब,गाँधी नगर,आगरा-2820003 मोबाइल नम्बर-9411684054
फिर हकीकत पर पर्देदारी





















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