(डॉ. गोपाल चतुर्वेदी)
वृन्दावन।छटीकरा रोड़ स्थित ठाकुर श्रीराधा गिरिधर गोपाल मन्दिर परिसर में अष्ट दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह ज्ञान यज्ञ महोत्सव अत्यंत श्रद्धा एवं धूमधाम के साथ प्रारंभ हुआ।महोत्सव का शुभारभ अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पूज्या दीदी मां साध्वी ऋतम्भरा ने वैदिक मंत्रोच्चार के मध्य दीप प्रज्वलित करके किया।इससे पूर्व गाजे-बाजे के मध्य
ठा.श्रीराधा गिरिधर गोपाल मन्दिर से कथा स्थल तक श्रीमद्भागवतजी की भव्य शोभायात्रा निकाली गई।जिसमें सैकड़ों महिलाएं पीत वस्त्र धारण किए एवं श्रीहरिनाम संकीर्तन करते हुए शामिल हुई।
पूज्या दीदी मां साध्वी ऋतम्भरा ने कहा कि वर्तमान समय में देश व समाज की उन्नति के लिए शिक्षा के साथ-साथ अध्यात्म का ज्ञान भी अत्यंत आवश्यक है।क्योंकि देश की
संस्कृति ही राष्ट्र निर्माण का द्योतक होती है।
तत्पश्चात व्यास पीठ पर आसीन विश्वविख्यात संत स्वामी गिरीशानंद सरस्वती महाराज ने अपनी मधुर वाणी के द्वारा सभी भक्तों-श्रृद्धालुओं को श्रीमद्भागवत महापुराण की अमृतमयी कथा का रसास्वादन कराते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत मानवीय जीवन के बहुमूल्य सूत्रों और सिद्धांतों की संहिता है।इस ग्रंथ के श्रवण करने से जीवन तो जीवन मृत्यु भी सुख मय बन जाती है।साथ ही इसमें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के सूत्र और सिद्धांत तथा समाधान निहित हैं।उन्हें समझ कर धारण कर जीवन में उतारने की परम् आवश्यकता है।
श्रद्धेय स्वामी गिरीशानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि सदगुरु का आश्रय लिए बिना प्रभु की भक्ति मिलना संभव नहीं है।जिस प्रकार नदी पार करने के लिए नौका की आवश्यकता होती है,उसी प्रकार भवसागर पार करने के लिए एवं प्रभु भक्ति पाने के लिए हमें सदगुरु की परम् आवश्यकता होती है।इसीलिए हमें अपने जीवन में सदगुरु अवश्य बनाने चाहिए।जिससे कि हमारा कल्याण हो सके।
विश्व हिंदू महासंघ भारत, मठ मन्दिर प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय वरिष्ठ उपाध्यक्ष पण्डित आर. एन. द्विवेदी (राजू भैया) ने कहा कि देश की भटकी हुई युवा पीढ़ी को सुधारने के लिए ऐसे धार्मिक आयोजनों की परम् आवश्यकता है,जिससे उनका हृदय व चित्त परिवर्तित हो और वे राष्ट्र निर्माण में सहयोगी बनें।
इस अवसर पर डॉ. गोविंदानंद सरस्वती महाराज, स्वामी महेशानंद सरस्वती महाराज, महोत्सव के मुख्य यजमान श्रीमती सरला-राजेन्द्र खेतान, डॉ. आलिया (अमेरिका), वरिष्ठ साहित्यकार डॉ गोपाल चतुर्वेदी, डॉ. गर्ग आदि की उपस्थिति विशेष रही।






















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