कार्यक्रम

ठाकुर प्रियावल्लभ लाल एवं ठाकुर विजयराधावल्ल लाल के त्रिदिवसीय पाटोत्सव में ठाकुर द्वय का पूजन-अर्चन वैदिक मंत्रोच्चार

वृन्दावन। छीपी गली स्थित प्रियावल्लभ कुंज में श्रीहितपरमानंद शोध संस्थान के द्वारा चल रहे ठाकुर प्रियावल्लभ लाल एवं ठाकुर विजयराधावल्ल लाल के त्रिदिवसीय पाटोत्सव में ठाकुर द्वय का पूजन-अर्चन वैदिक मंत्रोच्चार के मध्य किया गया। साथ ही ठाकुर जी का अत्यंत मनोहारी श्रृंगार किया गया। इससे पूर्व उनका पंचामृत से अभिषेक हुआ। समूचे मन्दिर को अत्यंत नयनाभिराम व चित्ताकर्षक ढंग से सजाया गया। महोत्सव के अंतर्गत डॉ. श्याम बिहारी खण्डेलवाल व डॉ. जयेश खण्डेलवाल की मुखियाई में मंगल बधाई-समाज गायन हुआ। जिसमें राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रख्यात सन्तों की वाणियों का संगीत की मृदुल स्वर लहरियों के मध्य गायन हुआ।
श्रीहितपरमानंद शोध संस्थान के संस्थापकाध्यक्ष आचार्य विष्णुमोहन नागार्च व समन्वयक डॉ. गोपाल चतुर्वेदी ने कहा कि श्रीहितपरमानंद दास महाराज 18वीं शताब्दी के रससिद्ध सन्त एवं प्रसिद्ध वाणीकार थे। प्रियावल्लभ कुंज में श्रीहितपरमानंद दास महाराज के सेव्य ठाकुर श्री विजयराधावल्लभ लाल एवं दतिया की महारानी बख़्त कुँवरि (प्रिया सखी) के सेव्य ठाकुर श्री प्रियावल्लभ लाल विराजित हैं।यह दोनों ही ठाकुर अत्यंत सिद्ध व चमत्कारिक हैं। इसीलिए इनके दर्शनों के लिए समूचे देश के प्रत्येक कोने से प्रतिवर्ष भक्त-श्रद्धालु यहाँ आते हैं।
राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, अलवर व भरतपुर के वरिष्ठ अनुसन्धान अधिकारी डॉ. सर्वेश कुमार शर्मा ने कहा कि श्रीहितपरमानंद दास जी महाराज ने अपने वाणी साहित्य में ब्रज का अत्यंत सूक्ष्म विवेचन किया है। उनके साहित्य से यह भी स्पष्ट होता है कि नागार्च परिवार में उत्पन्न होकर के प्रारम्भ में ही वृन्दावन आ गये।और गुरु हितगुलाब लाल गोस्वामी जी से गुरु दीक्षा लेकर तथा लघुमती व मधुमती जैसे रसिक जनों का साथ पाकर उनके प्रभाव से इन्होंने साहित्य सृजना की। इनके साहित्य के अंतर्गत वीररस,श्रृंगार रसों का अभाव परालक्षित होता है। इनके साहित्य से भक्ति रसमय रसास्वादन प्राप्त होता है।
राजस्थान ब्रज भाषा अकादमी के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर कृष्ण चन्द्र गोस्वामी ने कहा कि श्रीहितपरमानंद दास जी महाराज मूल रूप से भक्त हैं,कवि नही। अतः उनके भक्ति काव्य में जो पाठक अलंकारों की छटायें , कल्पनाओं की अपूर्व उड़ान, रीति और वृत्तियों की अद्भुत संयोजन आदि काव्य कला के कौतुकों के आश्वादन की कामना करेंगे, तो उन्हें निराशा हाथ लगेगी। जो भक्ति काव्य के आश्वादन के संकल्प के साथ श्रीहितपरमानंद जी की वाणियों का अध्ययन करेंगे वे अवश्य ही श्रीराधावल्लभ लाल की रस केलि के आनंद से अविभूत होंगे। श्रीहितपरमानंद जी राधावल्लभ लाल के प्रति एकनिष्ठ भाव रखने वाले भक्त कवि हैं।
दिल्ली से पधारे प्रख्यात भक्त एवं साहित्य के मनीषी विद्वान ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल ने कहा कि श्रीहितपरमानंद जी का सही नाम हितपरमानंद दास न होकर केवल हितपरमानंद ही था। इनकी वाणी में सर्वत्र इनकी छाप कहीं परमानंद कहीं हितपरमानंद और कहीं हित गुलाब परमानंद मिलती है। इससे ऐसे लगता है कि ये आजीवन ग्रहथ आश्रम में रहते हुए भी राधावल्लभ लाल के परम रसिक, अनन्य उपासक भक्त रचनाकार थे। भक्तमाल की कथा करते थे जिसका इनकी रचनाओं में प्रत्यक्ष प्रभाव परिलक्षित होता है।
पाटोत्सव में डॉ. सर्वेश कुमार शर्मा को “पांडुलिपि चंचरीक” एवं ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल को “साहित्य मनीषी” की मानद उपाधि से अलंकृत किया गया।
इस अवसर पर रामप्रकाश (मधुर), पार्षद रसिक वल्लभ नागार्च, चंद्रमोहन नागार्च, डॉ. चन्द्रप्रकाश शर्मा, रासबिहारी मिश्रा, जुगलकिशोर शर्मा, तरुण मिश्रा, राधाकांत शर्मा, भरत किशोर शर्मा, हितवल्लभ नागार्च, महंत मधुमंगल शरण शुक्ल,डॉ. राजेश शर्मा, लक्ष्मीनारायण तिवारी, विनोद शर्मा, रोहित दुबे, जितेंद्र सेन, भाजपा नगर अध्यक्ष विनीत शर्मा, जिला प्रचारक मनोज जी,पार्षद वैभव अग्रवाल, अभिनव मिश्रा, भोजराज, आनंद अग्रवाल, गुल्लू भैया आदि के अलावा विभिन्न क्षेत्रों के तमाम गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।साथ ही देश के विभिन्न राज्यों के भक्तों ने इस महोत्सव में सहभागिता की। महोत्सव के अंतर्गत संस्थान की मासिक पत्रिका “हितोत्सव” के नवीन अंक का विमोचन सन्तों व विद्वानों के द्वारा किया गया। पत्रिका के प्रधान संपादक डॉ. गोपाल चतुर्वेदी ने कहा कि यह पत्रिका राधावल्लभ सम्प्रदाय का प्रचार-प्रसार करने में पूर्ण समर्पण के साथ जुड़ी हुई है। राधावल्लभीय रसोपासना का संवर्धन करने का बीड़ा इस पत्रिका ने उठाया हुआ है। संस्थान के सचिव पार्षद रसिकवल्लभ नागार्च ने सभी अतिथियों का स्वागत उन्हें शॉल उड़ाकर किया।

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Rekha Singh

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