डाॅ.बचन सिंह सिकरवार
हाल में इजरायल की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपने कार्यकाल की दूसरी यात्रा दो दिवसीय कई माने में देश हित में बेहद खास रही है, जिसमें देश की रक्षा-सुरक्षा,सूचना एवं जैव प्रौद्योगिक, उन्नत प्रौद्योगिकी, उच्च कृषि तकनीक,सह रक्षा उत्पादन,साइबर सुरक्षा, आर्टिफिशियल इण्टेलिजेन्स, सेमीकण्डक्टर, व्यापार,ऊर्जा, खुफिया जानकारी आदि क्षेत्रों में कुल 17 समझौते हुए हैं और प्रधानमंत्री मोदी को जिस तरह वहाँ उनका भव्य स्वागत,सबसे बड़े समाचार पत्र ‘द यरुशलम पोस्ट’में प्रथम पृष्ठ पर मोदी के फोटो के साथ में हिन्दी में नमस्ते लिखा प्रकाशित किया जाना ,विपक्ष के नेता याइर लैपिड द्वारा हिन्दी में पोस्ट कर उनका स्वागत करना, नेसेट(संसद)में भाषण देने का अवसर प्रदान करना तथा संसद का ‘स्पीकर आॅफ द नेसेट मेडल’ से सम्मानित किया गया, इससे दोनों देशों के मध्य निरन्तर बढ़ते तथा गहन विश्वास सुरक्षा, रक्षा,उन्नत प्रौद्योगिकी, आर्थिक, व्यापार,कृषि नवाचार,जल प्रबन्धन आदि क्षेत्रों विभिन्न प्रकार से सहयोग और सहायता पर सहमति तथा समझौते होना। भारत को ‘विशेष रणनीतिक साझेदार’ का दर्जा दिया गया है, ऐसे में भारत के इजरायल के साथ प्रगाढ़ होते सम्बन्धों से उसके शत्रुओं विशेष रूप से पाकिस्तान तथा चीन का चिन्तित और परेशान होना स्वाभाविक है। वैसे भी वर्तमान में इजरायल दुनिया भर में भारत का एकमात्र ऐसा देश है,जिसने भारत के सबसे मुश्किल वक्त में रह सम्भव सहयोग और सहायता की है। इधर इस यात्रा को लेकर काँग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और उनकी बहन प्रियंका गाँधी अपनी ओछी राजनीति करने में पीछे नहीं रहे। उन्होंने जैसे कटु बयान दिये हंै उन्हें किसी स्थिति में उचित नहीं माना जा सकता। कुछ ऐसे ही वक्तव्य माक्र्सवादी साम्यवादी पार्टी तथा कुछ मुस्लिम नेताओं ने भी दिये हैं,जिनमें प्रधानमंत्री मोदी को मुसलमान विरोधी ठहराने और उनका नरसंहार की चाहत रखने वाला जताने की कोशिश की गई है,जो सच नहीं है। हकीकत यह है कि प्रधानमंत्री मोदी दुनिया के उन गिने-चुने नेताओं में शुमार हो गए हैं,जिन्हें इजरायल और फलस्तीन की सरकारों ने अपने-अपने सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान से सम्मानित किया है। इजरायल ने तो प्रधानमंत्री मोदी को उस स्थिति में सम्मानित किया है,जब इजरायल के इस दौरे से ठीक पहले भारत ने संयुक्त राष्ट्र में 100से अधिक देशों के साथ मिलकर इजरायल की पश्चिमी तट/वेस्ट बैंक में की गई सैन्य कार्रवाई आलोचना की है। भारत ने पहले तो सामूहिक निन्दा से दूर रहने की नीति अपनायी,लेकिन बाद में संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर कर दिए। वैसे भी मोदी के अरब देशों समेत सभी मुस्लिम देशों से अच्छे रिश्ते हंै,इनमें से अनेक ने तो उन्हें अपने सर्वोच्च पदकों से सम्मानित किया है। इजरायल यात्रा के दौरान भी प्रधानमंत्री मोदी ने इजरायल से स्पष्ट शब्दों में गाजा शान्ति प्रयासों के प्रति भी भारत का पूरा समर्थन दोहराया है।इसके लिए उसे युद्ध के स्थान पर संवाद,कूटनीतिक अपनाने का सुझाव दिया। उनका मानना है कि मध्यपूर्व/पश्मिेशिया की शान्ति सभी देशों के हित में है। अब जहाँ तक प्रियंका गाँधी का यह कहना कि उन्हें उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री अपनी इजरायल यात्रा पर नेसेट को सम्बोधित करते हुए गाजा में हजारों बेगुनाह पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के नरसंहार का उल्लेख करेंगे और उनके लिए न्याय की माँग करेंगे,किन्तु ऐसी नसीहत देते हुए उन्हें इस्लामिक दहशतगर्द संगठन ‘हमास’ के दहशतगर्दों की दहशतगर्दी की याद नहीं आयी,जिन्होंने इजरायल के एक हजारों से अधिक निर्दोष लोगों(यहूदियों) की नृशंस हत्या करने के साथ कई सौ लोगों का अपहरण कर लिया था,जो उस समय त्योहार मना रहे थे। वैसे भी प्रियंका गाँधी की इस हमदर्दी जताने की वजह सिर्फ चुनावों में अल्पसंख्यक समुदाय के थोक में वोट हासिल करना भर है। फिर भारत में केन्द्र में सत्तारूढ़ रहे राजनीतिक दलों विशेष रूप से काँग्रेस की सरकारें अरब देशों पर तेल की अधिक निर्भरता और अपने देश के मुसलमान वोट बैंक को देखते हुए इजरायल के गठन से लेकर नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने तक उसकी उपेक्षा/विरोध और फलस्तनियों एकतरफा समर्थन करती रही थीं, जबकि इजरायल ने बिना प्रतिफल की आशा किये भारत को विषम स्थितियों 1971भारत-पाक ,1999कारगिल और 2025में ‘आॅपरेशन सिन्दूर‘ पाकिस्तान से युद्ध के दौरान विभिन्न अस्त्र-शस्त्रांे (हथियार,गोला-बारूद ) तथा गुप्त जानकारियाँ देकर सहायता की है। इसके विपरीत किसी भी दुनिया के मुस्लिम मुल्क ने भारत की कभी किसी तरह की हिमायत तो दूर पाकिस्तान के भारत के कश्मीर को लेकर और उसके द्वारा घुसपैठिये/दहशतगर्द भेजने जैसे दूसरे मुद्दों पर गैर जिम्मेदाराना रवैये की मजम्मत तक नहीं की है। ऐसी दशा में प्रधानमंत्री मोदी का नेसेट को सम्बोधित करते हुए इजरायल की सरकार और जनता को मजबूत शब्दों में यह विश्वास दिलाना सर्वथा उचित है कि भारत उनके साथ आज भी है और आगे भी रहेगा। न हम 26/11 भूल हैं और न ही इजरायल पर 7 अक्टूबर, 2023 इस्लामिक कट्टरपंथी आतंकवादी संगठन ‘हमास’के हमले को। भारत स्वयं को लम्बे समय से आतंकवाद से पीड़ित रहा है और इस पर भारत का रुख/नीति स्पष्ट है। आतंकवाद को किसी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। आतंकवाद पर कोई दोहरा रवैया हमें स्वीकार नहीं है। नागरिकों की हत्या किसी सूरत/दशा में सही नहीं है। यह सब कहकर प्रधानमंत्री मोदी ने दुनिया को एक बार फिर जताता दिया कि भारत का रवैया अमेरिका और दूसरे देशों जैसा नहीं है,जो अपनी सुविधा के अनुसार आतंकवाद और आतंकवादियों को परिभाषित करते आए हैं। उनका यह कहना भी सही है कि आज की अनिश्चित दुनिया में भारत और इजरायल जैसे भरोसेमन्द साझेदारों के बीच मजबूत रक्षा साझेदारी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। हमारी मजबूत साझेदारी न केवल राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करती है,बल्कि वैश्विक स्थिरता और समृद्धि में भी योगदान देती है। भारज शीघ्र ही वैश्विक स्तर पर शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होंगे। दूसरी तरफ इजरायल नवाचार और तकनीकी क्षेत्र में एक पावर हाउस है। यह एक दूरदर्शी साझेदारी के लिए स्वाभाविक आधार तैयार करता है।भारत और इजरायल के मध्य मुक्त व्यापार समझौता(एफटीए)पर अगले दौर की वार्ता मई में किये जाने की उम्मीद जतायी है।
वैसे भी भारत-इजरायल के मध्य राजनीतिक सम्बन्ध दोनों देशों के हितों और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के इतिहास पर आधारित पर है। भारत के केरल के कोच्चि में यहूदियों के बसने का सिलसिला 68ईस्वी से प्रारम्भ हुआ।यहाँ के यहूदी अपनी उत्पत्ति राजा सुलेमान के समय से मानते हैं और उन्हें ‘कोचीन यहूदी’ कहा जाता है।कालान्तर में स्पेन से यहूदियों के निष्कासित किये जाने के पश्चात् पन्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के दौरान परदेसी यहूदी केरल के कोच्चि में आकर बस गए। जहाँ तक व्यापारिक सम्बन्धों की बात है तो ये 1000ईसा पूर्व और उससे भी पहले भारतीय उपमहाद्वीप की सिन्धु घाटी सभ्यता और मध्यपूर्व के बेबीलोनिया संस्कृति के समय देखे जाते हैं।सन् 1947 में भारत ने फलस्तीन के लिए संयुक्त राष्ट्र विभाजन योजना के विरुद्ध मतदान किया। इसके बाद सन् 1949 में संयुक्त राष्ट्र संघ में भ् इजरायल के प्रवेश पर भी भारत ने विरोध में मतदान किया। लेकिन फिर भी 17 सितम्बर, 1950 में इजरायल की सम्प्रभुता को मान्यता दी। इजरायल ने सन्1953 में बाम्बे(अब मुम्बई) में अपना वाणिज्यिक दूतावास खोला। सन् 1990 के दशक में भारत गणराज्य और इजरायल के बीच व्यापक आर्थिक,सैन्य और राजनीतिक सम्बन्ध रहे हैं। सन् 1992 में पूर्ण राजनयिक सम्बन्ध स्थापित हुए। आइ2यू2(इजरायल,इण्डिया,यूएई,अमेरिका) समूह का सदस्य हैं। भारत और इजरायल के बीच मजबूत द्विपक्षीय सम्बन्ध हैं जिनसमें समान विचारधारा और समान चुनौतियाँ का सामना सम्मिलित हैं। इन दोनों देश के बीच औद्योगिक तथा तकनीकी क्षेत्रों में सहयोग बढ़ रहा है। विगत अनेक वर्षों से इजरायल रक्षा, कृषि, विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा आतंकवादविरोधी क्षेत्रों में भारत के प्रमुख साझेदारों में से एक के रूप में उभरा है। यह साझेदारी उच्च स्तरीय राजनीतिक सहभागिता,बढ़ते आर्थिक सम्बन्धों और नवाचार एवं सुरक्षा में सहयोग से चिन्हित है,जो दोनों के बीच सम्बन्धों के निरन्तर गहरे होने को दर्शाती है। 2019 तक भारत इजरायल का तीसरा सबसे बड़ा एशियाई व्यापार भागीदार तथा कुल मिलाकर दसवाँ सबसे बड़ा व्यापार भागीदार था। सैन्य बिक्री को छोड़कर द्विपक्षीय व्यापार लगभग 6.3 अरब अमेरिकी डाॅलर था 2015 तक दोनों देश सूचना प्रौद्योगिकी ,जैव प्रौद्योगिकी और कृषि जैसे क्षेत्रांे पर ध्यान केन्द्रित करते हुए एक व्यापक द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। सन् 2017 में प्रधानमंत्री मोदी इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने।इसके बाद दोनांे देशों के रिश्ते खुले और बहुआयामी रणनीतिक साझेदारी में बदल चुके हैं। पिछले दशक में रक्षा,व्यापार,प्रौद्योगिकी और श्रम गतिशीलता के क्षेत्र में यह सम्बन्ध काफी गहरा हुआ है। हाल के वर्षों में भारत-इजरायल द्विपक्षीय व्यापार में कई गुना वृद्धि हुई है। दोनों देशों की टीमें एक महत्त्वाकांक्षी मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत करने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है। सन् 2022 तक भारत,इजरायल रूस के बाद भारत दूसरा सबसे बड़ा सैन्य उपकरण आपूर्ति कर्ता हैै।इजरायल के सभी हथियार निर्यात 42प्रतिशत भारत को प्राप्त होता है। सन् 1999 को कारगिल युद्ध और 2010 के बीच भारत ने इजरालय से रक्षा खरीद पर 9अरब डाॅलर किये हैं। 2022 तक इजरायल ने भारत से कच्चे तेल और हीरों पर 3.2अरब डाॅलर खर्च किये है। उनके रणनीतिक सम्बन्ध संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण/अभ्यास के साथ-साथ विभिन्न आतंकवादी समूहों की गतिविधियों पर खुफिया जानकारी करने तक विस्तारित है।2001 में गुजरात के भूकम्प के बाद इजरायल ने भारत को मानवीय सहायता प्रदान की। 2023 मेें हमास के इजरायल हुए हमले के बाद से भारत कथित तौर पर इजरायल को महत्त्वपूर्ण सैन्य सहायता प्रदान कर रहा है।समर्थन का प्रमुख क्षेत्र हर्मेस 900ड्रोन की आपूर्ति रहा है। 2024 में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के साथ,भारत ने ईरान से दूर और इजरायल की ओर भू राजनीतिक रुख अपनाया है।भारत से इजरायल प्रतिनिधित्व नई दिल्ली में दूतावास और मुुम्बई और बैंगलूरू वाणिज्यिक दूतावासों के माध्यम होता। भारतीय सरकार वर्तमान में यरुशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता नहीं देती है।इन सभी तथ्यों पर विचार करने पर स्पष्ट है कि भारत ने अपनी अनेक विवशताओं के कारण इजरायल का उतना सहयोग और सहायता नहीं की है,जिसके वह अधिकारी है। फिर भी उसने भारत के हर संकट में बिना किसी अपेक्षा/कई जोखिमों रहते उसकी भरपूर सहायता की है। अब भारत और इजरायल ने साझा बयान में आतंकवाद के खिलाफ खुफिया सहयोग,सुरक्षा समन्वय और अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर संयुक्त प्रयासों को और सुदृढ़ करने पर सहमति व्यक्त की है। भारत इजरायल मिलकर संयुक्त विकास,संयुक्त उत्पादन और प्रौद्योगिकी हस्तान्तरण की दिशा में आगे बढ़ेंगे। भारत स्वदेशी वायु रक्षा कवच‘ सुदर्शन चक्र’विकसित करने का विचार कर रहा है। अब आशा की जानी चाहिए कि भविष्य में भारत भी अपने इस विश्वासनीय देश की विषम स्थिति में सहायता करने को सदैव तत्पर रहेगा।ऐसा किया जाना स्वयं इजरायल से कहीं अधिक भारत के हित में होगा।
सम्पर्क-डाॅक्टर बचन सिंह सिकरवार वरिष्ठ पत्रकार, 63ब,गाँधी नगर,आगरा-2820003 मोबाइल नम्बर-9411684054

















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