डॉ.बचन सिंह सिकरवार
गत दिनों तमिलनाडु विधानसभा के पहले सत्र में राष्ट्रगान के अपमान को लेकर एक बार फिर चौथी बार राज्यपाल आर.एन.रवि को बगैर परम्परागत अभिभाषण पढ़े बहिर्गमन करने को विवश होना पड़ा,जिसके लिए कोई और नहीं इस राज्य की ‘द्रविड़ मुनेत्र कषगम’ (द्रमुक) सरकार जिम्मेदार है। इसका कारण उसका राज्यपाल के विधानसभा में अभिभाषण हेतु आगमन पर पहले राष्ट्रगान के स्थान पर पहले अपने राजकीय गीत बजाने की हठधर्मी है।उसका यह रवैया संवैधानिक परम्परा और उसकी मूल भावना के विपरीत है। वैसे भी इस मुद्दे पर पहले भी विवाद हो चुका है। इतना ही नहीं,उसके द्वारा विधानसभा में संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध विधेयक पारित किये जाते रहे हैं, जिनमें तमिल अस्मिता की आड़ में कहीं न कहीं अलगाववादी भावना निहित रही है। फिर जब उन पर राज्यपाल द्वारा स्वीकृति/ सम्मति नहीं दी जाती है,तो उन पर राज्य सरकार और तमिल लोगों की भावनाओं के विरुद्ध आचरण करने आरोप लगाये जाते रहे हैं। द्रमुक सरकार के केन्द्र सरकार से गैर जरूरी टकराव, केन्द्रीय योजनाओं के प्रति उदासीनता/न लागू करने, संविधान विरोधी और अलगाववादी भावनाएँ भड़काने से इस राज्य के लोगों का अहित तो हो रहा है,राष्ट्रीय एकता तथा अखण्डता की भावना को भी आघात लगता आ रहा है,पर अपनी ओछी राजनीति से यह पार्टी बाज नहीं आ रही है। ऐसा लगता है कि नया घटनाक्रम भी तमिलनाडु की द्रमुक सरकार का आगामी विधानसभा के चुनाव से पहले राज्यपाल के बहाने सुविचारित रणनीति के तहत भाजपा के नेतृत्व वाली:‘राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन’ (एन.डी.ए.) केन्द्र सरकार पर भेदभाव और उत्पीड़न का आरोप लगाने के उसके चुनावी एजेण्डा को बढ़ाने से लगता है,ताकि राज्य में भाजपा के बढ़ते प्रभाव को कम किया जा सके। यह प्रभाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तमिलनाडु के काशी तमिल संगमम,तमिल सूरत संगमम के आयोजनों ,उनके राज्य के विभिन्न हिन्दू मन्दिरांे के दर्शन समेत लोगों में हिन्दुत्व जगाने से उत्पन्न हुआ है।
खेद की बात यह है कि तमिलनाडु की द्रमुक सरकार के इस अनुचित रवैये पर हमेशा की तरह काँग्रेस, वामपंथी समेत देश के दूसरे गैर भाजपायी राजनीतिक दल खामोश ही नहीं, बल्कि उसके द्वारा केन्द्र सरकार पर आरोप लगाये जाने से आनन्द का अनुभव कर रहे होंगे। अपनी राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता के आगे उन्हें न तो द्रमुक की राष्ट्रगान के अपमान/संवैधानिक परम्परा की आवमानना दिखायी देती है और न विधानसभा द्वारा पारित उसके विधेयकों में गैर संवैधानिक/अलगाववादी प्रावधानों में ही कोई खोट। आश्चर्य की बात यह है कि ये गैर भाजपायी राजनीति दल ही सबसे ज्यादा संविधान के सबसे रक्षक होने का बड़ी बेशर्मी दावा/ढिंढोरा पीटते रहते हैं। वैसे भी द्रमुक का जन्म ही ‘ब्राह्मणवाद’ के विरोध से हुआ,फिर हिन्दी, उत्तर-दक्षिण, अब खुले आम हिन्दू या सनातन धर्म के विरोध पर उतर आयी है। उसके उपमुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री एम.के.स्टालिन के पुत्र उदयनिधि ने बाकायदा सनातन विरोधी सम्मेलन में सनातन धर्म को कैंसर, डेंगू,मलेरिया जैसे रोगों से भी घातक बताते हुए उसके उन्मूलन की बात कही।उनके इस रवैये से स्पष्ट है कि द्रमुक नेताओं को देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं की भावनाओं को आघात पहुँचने की कोई परवाह नहीं। उस समय भी काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे पुत्र और कर्नाटक की काँग्रेस की राज्य सरकार में प्रियांग खरगे ने भी उनके कहे का समर्थन करते हुए सनातन धर्म की आलोचना की थी।
यूँ तो तमिलनाडु की द्रमुक सरकार विभिन्न अवसरों और मामलों में हिन्दुओं के साथ भेदभाव करती आयी है,पिछले दिनों उसने न्यायालय के आदेश के बाद भी तिरुप्पारनकुन्द्रम पहाड़ी पर स्थित भगवान सुब्रह्मणयम स्वामी मन्दिर के पास बने दीपथून स्तम्भ पर दीप प्रज्ज्वलित करने करने नहीं दिया।अब इसी 6जनवरी को मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै खण्डपीठ ने न केवल तिरुप्पारनकुन्द्रम पहाड़ी पर स्थित भगवान सुब्रह्मणयम स्वामी मन्दिर के पास बने दीपथून स्तम्भ पर दीप प्रज्ज्वलित करने की अनुमति के एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखा,बल्कि उसने द्रमुक सरकार की आलोचना करते हुए कहा,‘‘वह इसे राजनीतिक रंग न दे और अपने राजनीतिक एजेण्डे के लिए उसे इस स्तर नहीं गिरना चाहिए। यह हास्यास्पद एवं अविश्वासनीय है कि राज्य को इस बात का डर है कि श्रद्धालुओं को एक विशेष दिन दीपक जलाने की अनुमति देने से अशान्ति फैल जाएगी।’इस धार्मिक प्रथा के कारण कानून व्यवस्था को लेकर आशंका है वह उनके द्वारा अपने फायदे के लिए पैदा किया गया एक ’काल्पनिक भूत’मात्र है।
ऐसे ही द्रमुक सरकार द्वारा केन्द्रीय नई शिक्षा नीति का यह कह कर विरोध किया,इसके जरिए वह तमिलों पर हिन्दी थोपना चाहती है।
अब राजभवन की ओर से जारी बयान में कहा,‘‘ माइक कई बार बन्द किया गया और उन्हें बोलने तक नहीं दिया गया। राष्ट्रगान का फिर से अपमान और संविधान द्वारा निर्धारित मौलिक कर्त्तव्य की अनदेखी। सदन में प्रस्तुत सरकारी अभिभाषण में कई तथ्यात्मक गलतियाँ और भ्रामक दावे शामिल हैं। आम लोगों से जुड़े कई अहम मुद्दों की पूरी तरह अनदेखी की गई है। तमिलनाडु में 12 करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित करने के दावे जमीनी हकीकत से दूर हैं। कई समझौते तो कागजों तक सीमित हैं। वास्तविक निवेश इसका बहुत छोटा हिस्सा है। आँकड़ों का हवाला देते हुए राजभवन ने कहा कि कुछ साल पहले तक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश प्राप्त करने वाले राज्यों में तमिलनाडु चौथे स्थान पर था,पर अब यह छठे स्थान के लिए संघर्ष कर रहा है। गौरतलब है कि इससे पहले भी राज्यपाल आर.एन.रवि और राज्य सरकार के बीच टकराव की ऐसी ही स्थिति बन चुकी है। उधर मुख्यमंत्री एम.के.स्टालिन ने राज्यपाल के इस कदम की कड़ी निन्दा की। यह उच्च पद की गरिमा, परम्पराओं और मूल्यों के अनुरूप नहीं है। सदन और राज्य के लोगों का अपमान है। सदन से राज्यपाल के जाने के बाद जब विधानमण्डल अध्यक्ष अप्पावु ने गवर्नर के सम्बोधन का तमिल अनुवाद पढ़ना शुरू किया,तब विरोधस्वरूप विपक्षी अन्नाद्रमुक ने कानून व्यवस्था की विफलता का आरोप लगाते हुए वॉक आउट किया।उनके साथ दूसरे विपक्षी दल पी.एम.के. के सदस्य भी सदन के बाहर निकल गए। वैसे द्रमुक अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री एम.के.स्टालिन के असल इरादों को समझने के लिए उनका यह वक्तव्य ही पर्याप्त है कि उनकी पार्टी संविधान में संशोधन के लिए समान विचारधारा वाले दलों के साथ काम करेगी,ताकि राज्यपाल द्वारा विधानसभा को सम्बोधित करने के प्रावधानों का हटाया जा सके। उन्होंने विधानसभा में एक प्रस्ताव पेश किया,जिसमें कहा गया कि केवल सरकार द्वारा तैयार किया अभिभाषण ही आधिकारिक रिकार्ड रखा जाएगा। संविधान के अनुच्छेद 176 के अन्तर्गत परम्परागत अभिभाषण राज्य सरकार द्वारा तैयार किया जाता है और इसे राज्यपाल को पूरी तरह पढ़ना चाहिए। राज्यपाल ने नियम,परम्परा और मूल्यों का उल्लंघन कर वॉक आउट किया है,जो स्वीकार्य नहीं है। राज्यपाल को व्यक्तिगत राय व्यक्त करने या किसी हिस्से को छोड़ने का अधिकार नहीं है। राज्यपाल के व्यवहार को तमिल लोगों की भावना के खिलाफ बताया। राज्यपाल को राज्य की भलाई और लोगों के विकास में रुचि रखनी चाहिए। उन्हें लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार के फैसलों में सहयोग करना चाहिए। वे इसके विपरीत कार्य कर रहे हैं।
तमिलनाडु की विधानसभा के विशेष सत्र में पारित 12 में से 10विधेयक 13 नवम्बर,2023 को बिना कारण बताये वापस लौटा दिये और शेष दो विधेयक राष्ट्रपति को भेज दिये। इसके बाद 18नवम्बर को तमिलनाडु विधानसभा ने विशेष सत्र इन विधेयकों का पुनः पारित कर 23 नवम्बर को राज्यपाल के सचिवालय को भेज दिये। 8 अप्रैल, 2025 को उच्चतम न्यायालय की सीमने ऐतिहासिक निर्णय में राज्यपालों के विधेयकों पर निर्णय लेने अधिकार की समय सीमा तय कर दी। न्यायाधीश जे.बी.पारदीवाला और न्यायाधीश आर.महादेवन की पीठ ने तमिलनाडु के मामले में फैसला सुनाते हुए कहा,‘‘राज्यपाल के पास वीटो पॉवअर नहीं है। इससे तमिलनाडु की मुख्यमंत्री एम.के.स्टालिन की सरकार को बड़ी राहत मिली। ऐसे विधेयकों को रोका जाना अवैध है। यह मनमाना कदम है और कानून की दृष्टि से सही नहीं है। राज्यपाल को विधानसभा की सहायता और सलाह देनी चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि विधानसभा से पारित विधेयक पर राज्यपाल को एक माह के अन्दर स्वीकृति दे देनी चाहिए। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उच्चतम न्यायालय को ‘प्रेसिडेंसियल रेफरेंस’ भेजा।इसमें यह माँग की गई कि क्या उच्चतम न्यायालय राज्यपाल और राष्ट्रपति की स्वीकृति लिए राज्य के विधेयकों को मंजूरी देने के लिए समय सीमा निर्धारित कर सकता है? भारतीय संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत उच्चतम न्यायालय को सौंपे गए इस ज्ञापन में राष्ट्रपति ने कुछ सवाल पूछे हैं। इस नोट में यह सवाल भी शामिल है,क्या राज्य विधान मण्डल में पारित विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति के बिना लागू किया जा सकता है? इस मामले में नेता प्रतिपक्ष एवं काँग्रेस के सांसद राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट के माध्यम कहा,‘‘ भारत की ताकत उसकी विविधता है,जो राज्यों का एक संघ है और हर किसी की अपनी आवाज है। लेकिन केन्द्र में सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार राज्यों को परेशान कर रही है,जबकि हो इसका उलट रहा है।
सन् 2021 में तमिलनाडु का राज्यपाल का पद सम्हालने वाले आर.एन.रवि ‘भारतीय पुलिस सेवा’(आइ.पी.एस.)अधिकारी और सी.बी.आई.में भी कार्य कर चुके हैं,लेकिन द्रमुक सरकार के असंवैधानिक और अलगाववादी भावना के चलते उनका उससे कभी सामंजस्य नहीं बना।द्रमुक सरकार उन पर भाजपा के प्रवक्ता या एजेण्ट की तरह कार्य करने का आरोप लगाती आयी है।यहाँ तक कि वह राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से उन्हें हटाने की माँग कर चुकी है।राज्यपाल ने कहा कि संविधान उन्हें किसी कानून पर अपनी सहमति रोकने का अधिकार देता है। राजभवन और राज्य सरकार का यह विवाद उच्चतम न्याय और राष्ट्रपति भवन तक भी पहुँचा है। जहाँ तक भारतीय संविधान का प्रश्न है तो इसका संघीय ढाँचा देश की एकता और प्रशासनिक सन्तुलन की आधारशिला है,जिसमें केन्द्र और राज्यों के मध्य अधिकारों का स्पष्ट विभाजन किया गया है,पर विभाजन अराजकता या टकराव का लाइसेंस नहीं देता। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में केन्द्र सरकार की भूमिका सिर्फ समन्वयक की ही नहीं,वरन् संविधान के अनुच्छेद 355 के तहत राज्यों में संवैधानिक व्यवस्था सुनिश्चित करने की भी है। वर्तमान केन्द्र सरकार ने अपने 11वर्ष के कार्यकाल में किसी भी निर्वाचित राज्य सरकार को बर्खास्त नहीं किया है,जबकि काँग्रेस ने सत्ता में रहने के दौरान अनुच्छेद 356 का जमकर दुरुपयोग करते तमाम राज्य की सरकारों को गिराया था। अब केन्द्र सरकार के संयम का लाभ उठाते हुए राज्य सरकारें स्वयं को लगभग स्वतंत्र सत्ता केन्द्र समझने लगी हैं और केन्द्र से टकराव को अपना राजनीतिक हथियार बना रही हैं,जबकि वे अच्छी तरह जानती हैं कि भारत एक सम्प्रभु,एकीकृत गणराज्य है,जहाँ केन्द्र ही सर्वोच्च संवैधानिक प्राधिकरण है और राज्यों को अपनी सीमा में रह कर कार्य करना होता है। यदि वे कानून से ऊपर स्वयं को रखेंगी और संघीय ढाँचे को राजनीतिक ढाल की तरह इस्तेमाल करेंगी,तो उनकी यह प्रवृत्ति देश की एकता,अखण्डता के लिए विघटनकारी और संस्थागत अविश्वास की ओर ले जाएगी।इसमें हर किसी का नुकसान है। ऐसे में केन्द्र सरकार को भी संवैधानिक शक्तियों को प्रयोग करते हुए उनके असंवैधानिक कार्यों के लिए दण्डित करने में संकोच नहीं करना चाहिए,ताकि देश की स्वतंत्रता, एकता,अखण्डता हरहाल में अक्षुण्ण रहे।
सम्पर्क-डॉक्टर बचन सिंह सिकरवार वरिष्ठ पत्रकार, 63ब,गाँधी नगर,आगरा-2820003 मोबाइल नम्बर-9411684054




















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