श्रीव्यास पंचमी के अवसर पर श्रीरसिक अनन्य माल ग्रंथ की अप्रमाणिकता पर संतों ने डाला प्रकाश
वृन्दावन।बाग बुंदेला क्षेत्र स्थित किशोर वन में विशाखा सखी के अवतार हरित्रयी के आचार्य संत रसिक शेखर अनन्य शिरोमणि हरिराम व्यास महाराज का 515वां चतुर्दिवसीय प्राकट्योत्सव विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर आयोजित सन्त-विद्वत सम्मेलन में अपने विचार व्यक्त करते हुए संत श्रीहरिप्रिय दास महाराज ने “श्रीरसिक अनन्य माल” की अप्रमाणिकता के संदर्भ में महत्वपूर्ण तथ्य रखते हुए कहा कि इस ग्रंथ में महनीय महापुरुषों के चरित्रों के साथ उनकी गुरु परंपरा एवं अन्य अनेक उपद्रव किए गए हैं,जिससे इतिहास विकृत होता है। अपने आचार्य के उत्कर्ष को दिखाने के लिए दूसरे आचार्यों को नीचा दिखाना और अपने आचार्य का शिष्य घोषित करना इस ग्रंथ की मूल विषय वस्तु है,जो कि सर्वथा असत्य पर स्थापित है। इस ग्रंथ में सबसे बड़ी जो सत्य एवं अकल्पनीय वस्तु है, वह यह है कि इसे एक गौडीय संत द्वारा लिखित बताया गया है। जबकि यह एक काल्पनिक ग्रंथ है और जाली ग्रंथ जो किसी विद्वेषी के द्वारा गौडीय परंपरा ही नहीं श्रीनिंबार्क और श्रीवल्लभकुल के आचार्यों तक को श्रीहित हरिवंश का शिष्य घोषित किया गया है।
उन्होंने बताया कि लगभग 10-15 ग्रंथों के प्रमाण के आधार पर इस “श्रीरसिक अनन्य माल” की अप्रमाणिकता सिद्ध होती है।जिसके प्रमाण में उन्होंने लगभग 70-80 हस्तलिखित पोथी एवं प्राचीन मुद्रित ग्रंथों की स्लाइड्स प्रस्तुत की।अकाट्य प्रमाणों के द्वारा उन्होंने इस ग्रंथ के जाली लेखक का नाम भी उजागर करते हुए कहा कि “श्रीहित हरिवंश अष्टक” जिसे कि प्रबोधानंद सरस्वती द्वारा रचित बताया जाता है, वह भी इसी लेखक की कुचेष्टा है एवं “श्रीव्यास वाणी” में 87 सखियों के अतिरिक्त जितनी भी सखियां जोड़ी गई हैं, वह भी इसी लेखक के द्वारा ऐतिहासिक छेड़छाड़ है। इसी लेखक ने “श्रीहित हरिवंश चरित्र” नामक ग्रंथ भी लिखा है। श्रीहरिप्रिय दास महाराज ने श्रीराधाबल्लभीय ग्रंथों के ही अनेक उदाहरण प्रस्तुत कर “श्री रसिक अनन्य माल” की अप्रामाणिकता सिद्ध की।
इससे पूर्व संतों व विद्वानों की सन्निधि में “श्रीरसिक अनन्य माल की अप्रमाणिकता” ग्रंथ का विमोचन किया गया।
संत-विद्वत सम्मेलन में श्रीमद्भागवत के प्रकांड विद्वान आचार्य नेत्रपाल शास्त्री, संत प्रवर रामानंद दास महाराज, प्रख्यात साहित्यकार “यूपी रत्न” डॉ. गोपाल चतुर्वेदी, आचार्य हेमकिशोर गोस्वामी, आचार्य चंद्रकिशोर गोस्वामी, आचार्य राजेश पाण्डेय, डॉ. राधाकांत शर्मा, आचार्य विष्णुकांत शास्त्री, पंडित जगदीश शास्त्री, योगेंद्र ब्रजवासी, पुंडरीक दास, प्रमुख समाजसेवी गोवर्धन दास अग्रवाल, महंत मंगल शरण दास शुक्ला, गोपाल शरण शर्मा, धर्मेश शर्मा, प्रो. गोपाल शर्मा आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। संचालन डॉक्टर भागवत किशोर नांगिया ने किया।
किशोर वन के वरिष्ठ सेवायत आचार्य घनश्याम किशोर गोस्वामी एवं आचार्य जयकिशोर गोस्वामी ने समस्त सन्तों, विद्वानों व धर्माचार्यों का अंगवस्त्र, माल्यार्पण, चंदन एवं सुगंधित द्रव्य प्रदान कर सम्मान किया।























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