-“यूपी रत्न” डॉ. गोपाल चतुर्वेदी
एडवोकेट
वरिष्ठ साहित्यकार/पत्रकार
प्रख्यात साहित्यकार, सहृदय-श्रेष्ठ श्री उदय प्रताप सिंह जी न केवल मैनपुरी के अपितु समूचे देश के गौरव हैं। उन्होंने साहित्य, शिक्षा व राजनीति के क्षेत्र में बनाए गए कीर्तिमानों के द्वारा अपनी जो एक अलग पहचान बनाई है, वो अति प्रशंसनीय है।दरअसल, वे एक ऐसे व्यक्ति हैं; जैसे कि आज कल प्रायः नहीं मिलते हैं।
उनसे मेरी प्रतिबद्धता के मूल में मेरे परिवार से उनकी बहुत पुरानी घनिष्ठता है।मेरे पूज्य पितामह स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी ने ब्रिटिश काल में हिन्दी भाषा व साहित्य के उत्थान व संरक्षण के लिए हिन्दी साहित्य सम्मेलन व अखिल भारतीय ब्रज साहित्य मण्डल के प्रधानमंत्री रहते हुए जो अनेकों कार्य किए, उन्हें राष्ट्र भाषा हिन्दी का इतिहास कभी भी नहीं भुला पाएगा।उनके ही अथक प्रयासों से महाकवि देव की जन्मभूमि कुसमरा (मैनपुरी) में महाकवि देव स्मारक की स्थापना हुई थी।उन्होंने ही सुजरई की रानी के इकलौते पुत्र स्व. लाल सूरज भान सिंह के साहित्य प्रेम को दृष्टिगत रखते हुए मैनपुरी के लेन गंज पार्क में लाल सूरज भान सिंह पुस्तकालय की स्थापना कराई थी।जिसके वो आजीवन मंत्री रहे।10 दिसम्बर सन् 1953 में अखिल भारतीय ब्रज साहित्य मण्डल का जो अधिवेशन हुआ था, उसके संयोजक भी स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी थे।उस समय श्री उदय प्रताप सिंह जी अपनी युवावस्था में थे।इस सम्मेलन का उन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा।क्योंकि इस सम्मेलन में हिन्दी जगत की मूर्धन्य विभूतियां पधारी थीं।जिनमें प्रमुख थे – मैनपुरी के राजा स्वर्गीय गोविन्द राम सिंह, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन महामहिम राज्यपाल स्वर्गीय डॉ. कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी, महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”, महीयसी स्वर्गीय महादेवी वर्मा, स्वर्गीय डॉक्टर बाबू गुलाब राय, स्वर्गीय डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, स्वर्गीय आचार्य विश्वनाथ प्रसाद, स्वर्गीय डॉक्टर बरसाने लाल चतुर्वेदी, स्वर्गीय डॉक्टर चतुर्सेन शास्त्री, स्वर्गीय शिशु पाल सिंह “शिशु”, स्वर्गीय
हरिश चन्द्र देव वर्मा “चातक” एवं स्व. बलवीर सिंह “रंग” आदि। इस सम्मेलन के बाद श्री उदय प्रताप सिंह जी हमारे पूज्य पितामह से अति निकटता से जुड़ गए।कालांतर में यह निकटता हमारे सारे परिवार से अति घनिष्ठता में तब्दील हो गई।हमारे ताऊजी व प्रख्यात साहित्यकार स्व. जगत प्रकाश चतुर्वेदी तो उनके घनिष्ठ मित्र थे।इस सब के चलते और अपनी साहित्यिक रुचि की वजह से मैं सन् 1975 से उनका स्नेह भाजक बना हुआ हूं।
सम्मान्य श्री उदय प्रताप सिंह जी को मैं “चाचा जी” कहकर संबोधित करता हूं।साथ ही वे मेरे अति आदरणीय हैं।परन्तु उनका मेरे प्रति व्यवहार शुरू से ही दोस्ताना रहा है।जब वे मदन इण्टर कॉलेज, भोगाँव (मैनपुरी) के प्राचार्य थे, तब वे समय मिलते ही प्रायः मेरे मैनपुरी स्थित निवास पर आ जाते थे और मुझे अपने साथ लेकर पैदल ही घुमक्कड़ी के लिए यत्र-तत्र चल देते थे। कभी वे कहते थे कि आज चौधरी सूरज सिंह यादव (पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष) के यहां चलना है, कभी वे कहते कि श्री नरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हिन्दी प्रवक्ता, क्रिश्चियन इण्टर कॉलेज) के यहां चलना है, तो कभी कहते कि आज श्री लाखन सिंह भदौरिया “सौमित्र” (प्रख्यात साहित्यकार, भोजपुरा) के यहां चलना है। आदि-आदि। पैदल चलने के कारण व अनेक लोगों से उनकी व हमारी दुआ-सलाम और पारस्परिक बातचीत की वजह से इस कार्य में कई-कई घंटे लग जाते थे।इस सब में उन्हें व हमें अत्यधिक आनन्द आता था।इतना ही नहीं कभी वे कहते बेवर चलना है, कभी कहते कुरावली चलना है, तो कभी कहते कुसमरा चलना है।वस्तुत: उनका आत्मीय जगत व व्यवहार जगत अत्यन्त व्यापक था और अभी भी है।
मैं भी जब कभी उनसे मिलने भोगांव जाता था, तो वे मेरे सम्मान में अपने कॉलेज में ही स्थानीय कवियों व साहित्यकारों को एकत्रित कर लिया करते थे।साथ ही काव्य गोष्ठी हुआ करती थी।इसके अलावा वे हम सभी का तरह-तरह के मिष्ठान, नमकीन, चाय व ठंडा आदि से स्वागत करते थे।इस बैठक में प्रायः होते थे – स्व. देवदत्त दुबे “देव सरोज”, स्व. दिनेश “निर्भय”, श्री बदन सिंह “मस्ताना” आदि। मेरे लिए वे दिन अत्यन्त आनन्द, स्फूर्ति, प्रेरणा व ऊर्जा आदि देने वाले थे।
मैं अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के चलते सन् 1982 में वकालत के व्यवसाय में आ गया था।क्योंकि मेरे पितामह स्व. पण्डित सियाराम चतुर्वेदी नामी-गिरामी वकील थे।जो कि कई वर्षों तक जिला शासकीय अधिवक्ता भी रहे।परन्तु श्री उदय प्रताप सिंह जी मेरी साहित्यिक रुचि व अपने अत्यधिक स्नेह के चलते यह चाहते थे कि मैं शिक्षा के क्षेत्र में आऊं।क्योंकि उनका मानना था कि साहित्य व शिक्षा एक दूसरे के पूरक हैं।उन्हीं दिनों नेशनल स्नाकोत्तर महाविद्यालय, भोगांव (मैनपुरी) में राजनीति विज्ञान के प्रवक्ता पद हेतु आवेदन विज्ञापित हुए थे। अतएव मैंने उनके कहने पर आवेदन कर दिया।बाद को वे मेरी सिफारिश के लिए स्वयं मुझे अपने साथ लेकर वहां गए। परन्तु कुछ विसंगतियों के कारण मेरी वहां नियुक्ति नहीं हो सकी।जिसका उन्हें बहुत दिनों तक काफी मलाल रहा।
बाद को मैं वकालत के साथ-साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सक्रिय हो गया।मुझे पत्रकार के रूप में देखकर उन्हें अतिशय प्रसन्नता होती थी और आज भी है। मैं जब मैनपुरी से प्रकाशित प्रमुख हिन्दी साप्ताहिक “बलिदान” का साहित्यिक संपादक था, तब मैंने उसमें “मैनपुरी के कवि” नामक धारावाहिक श्रृंखला प्रारंभ की थी।जिसमें मैं प्रत्येक सप्ताह मैनपुरी जनपद में जन्मे कवियों का विस्तृत परिचय व उनकी प्रमुख कविताओं का प्रकाशन करता था।इस श्रृंखला में मैंने श्री उदय प्रताप सिंह जी को भी अत्यन्त प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया था।साथ ही मैंने उसके कुछ विशेषांकों में उनकी कुछ राष्ट्रवादी कविताएं मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित की थीं।मेरे इस कार्य की उन्होंने भूरि-भूरि प्रशंसा की।वे कहते थे – “गोपाल जी, आपने मैनपुरी के अनेकों गुमनाम कवियों को खोज-खोज कर उन्हें जो पहचान दी है, वो अति प्रशंसनीय है।”
विद्वता की साकार प्रतिमूर्ति श्री उदय प्रताप सिंह जी हिन्दी व अंग्रेजी के प्रकांड विद्वान हैं।उन्हें हजारों विद्यार्थियों के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के मुखिया, देश के पूर्व रक्षा मंत्री व उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. मुलायम सिंह यादव जी को भी आजाद हिन्द इण्टर कॉलेज, करहल (मैनपुरी) में शिक्षा देने का गौरव प्राप्त है।उनकी अपनी मातृ भाषा हिन्दी के अलावा अंग्रेजी भाषा पर भी अत्यधिक पकड़ है।इसी के चलते उन्होंने अनेकों अंग्रेजी कविताओं का हिन्दी पद्यानुवाद किया है।जो कि काफी चर्चित रहा है।
“उदयजी” के नाम से प्रख्यात श्री उदय प्रताप सिंह जी के पूज्य पिताश्री स्व. डॉ. हरि प्रताप सिंह चौधरी अपने सद्गुणों के चलते “अजात शत्रु” के नाम से प्रख्यात थे। वही संस्कार उन्हें अपने पूज्य पिताश्री से विरासत में मिले हैं। वे सही अर्थों में मानवतावादी हैं।राष्ट्रवाद की भावना उनमें कूट-कूट कर भरी हुई है।वह सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि कवि हैं।विभिन्न सामाजिक संदर्भों व सामाजिक विसंगतियों पर उन्होंने जमकर लिखा है और लिख रहे हैं।वे आज भी अपनी 92 वर्ष की आयु में लखनऊ में रहते हुए निरन्तर काव्य लेखन में रत हैं।साथ ही वे सोशल मीडिया पर अत्यधिक सक्रिय हैं।उनका लेखन बहुआयामी है।उन्हें छंद, गीत, गजल, रूबाई, गद्य गीत आदि लिखने में महारथ हासिल है।वे जितने कवि सम्मेलनों में लोकप्रिय रहे हैं, उतने ही मुशायरों में भी। मैं बडभागी हूं, जो मुझे उनके साथ अनेक कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है।
श्री उदय प्रताप सिंह जी चूंकि मूलतः शिक्षक हैं, इसलिए शिक्षकों व विद्यार्थियों के प्रति उनकी अत्यधिक प्रतिबद्धता है।उनमें अध्यापकों के प्रति श्रद्धा, मान-सम्मान व सहानुभूति और विद्यार्थियों के प्रति सहज वात्सल्य भाव है।उन्हें किसी भी प्रकार का अभिमान छू तक नहीं गया है।चाहे वे आजाद हिन्द इण्टर कॉलेज, करहल (मैनपुरी) के शिक्षक रहे हों, चाहे मदन इण्टर कॉलेज, भोगांव (मैनपुरी) व नारायण इण्टर कॉलेज, शिकोहाबाद (फिरोजाबाद) के प्राचार्य रहे हों, चाहे पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य रहे हों, चाहे लोक सभा सांसद रहे हों, चाहे राज्य सभा सांसद रहे हों और चाहे उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष रहे हों।इन सभी पदों पर रहते हुए उनकी आत्मीयता, सहजता, सरलता, कर्मठता, उदारता, परोपकारिता आदि किसी में कहीं पर बिल्कुल भी फर्क नहीं आया है।
आज मुझे याद आ रहे हैं उनकी कर्मठता के वे दिन जब वो मदन इण्टर कॉलेज, भोगांव (मैनपुरी) के प्राचार्य थे।वे प्रतिदिन शिकोहाबाद स्थित अपने स्थाई निवास से भोगांव रोडवेज बस के द्वारा आया-जाया करते थे।कभी कोई विशेष कार्य हो तभी वे भोगांव में ठहरते थे।उनकी ये दिनचर्या कई वर्षों तक निरंतर चली।उनकी ईमानदारी बेमिसाल है। वे अब तक विभिन्न उच्च पदों पर आसीन रहे हैं, परन्तु उन्होंने कभी भी किसी अनुचित कार्य की सिफारिश न तो स्वयं स्वीकार की है और न ही किसी अन्य से की है। जो कि आज के समय में अत्यन्त दुर्लभ है।
श्री उदय प्रताप सिंह जी की धर्म पत्नी स्व. डॉ. चैतन्य यादव अत्यन्त विदुषी महिला थीं।जिन्होंने कि बी.डी.एम. म्युनिसिपल महाविद्यालय, शिकोहाबाद (फिरोजाबाद) में कई वर्षों तक प्रवक्ता के पद पर कार्य किया।संयोग से मेरी धर्मपत्नी श्रीमती वसुधा चतुर्वेदी भी उनकी विद्यार्थी रही हैं।हमारी पत्नी बताती हैं, कि मैडम अत्यन्त सज्जन व उदार थीं।उन्होंने अपने पतिदेव को काव्य के क्षेत्र में सदैव प्रेरित किया।चूंकि उनका कण्ठ अत्यन्त मधुर था, इसलिए वे अपने पतिदेव की कविताओं का संगीतमय गायन कर हम सभी को भाव-विभोर कर देती थीं।कभी-कभी कॉलेज के विशेष कार्यक्रमों में श्री उदय प्रताप सिंह जी को भी सादर आमंत्रित किया जाता था।उन्हें सुनकर हम सभी आनंदित हो जाया करते थे।
हमारे अलावा हमारे ससुराल पक्ष से भी अति घनिष्ठता के चलते श्री उदय प्रताप सिंह जी सन् 1984 में धातरी (फिरोजाबाद) में संपन्न हुए हमारे विवाह समारोह में सपत्नीक शामिल हुए थे।क्योंकि वे हमसे और हमारे ससुराली जनों से भी संबद्ध थे।हमारे ससुर साहब स्वर्गीय कृष्ण चंद्र मिश्र गिरधारी इंटर कॉलेज, सिरसागंज (फिरोजाबाद) और साले स्वर्गीय राजेश मिश्र भारतीय इंटर कॉलेज, धातरी (फिरोजाबाद) में अध्यापक थे।इसके अलावा हमारे विवाह के मध्यस्थ स्व. साहित्य प्रकाश दीक्षित उदय जी के अत्यन्त घनिष्ठ मित्र थे।जो कि भारतीय इण्टर कॉलेज, धातरी (फिरोजाबाद) के प्राचार्य व समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता थे। साथ ही हमारी पत्नी श्रीमती वसुधा चतुर्वेदी उनकी पत्नी स्व डॉ. चैतन्य यादव की प्रिय छात्रा रहीं थीं।
डॉ. चैतन्य यादव का सन् 1987 में आकस्मिक निधन हो गया।उनके न रहने पर उदयजी अत्यन्त टूट गए।क्योंकि उनसे उनका अत्यन्त भावनात्मक लगाव था।उनके निधन के बाद वे स्व. मुलायम सिंह यादव जी के आग्रह पर राजनीति के क्षेत्र में आ गए।क्योंकि नेता जी को अपनी पार्टी के लिए उन जैसे शिक्षित, जुझारू, कर्मठ व ईमानदार व्यक्ति की तलाश थी।
यह अत्यन्त हर्ष का विषय है कि उनसे यशस्वी सुपुत्र प्रोफेसर डॉ. असीम यादव (पूर्व विधान परिषद सदस्य) ने अपने पूज्य पिताश्री के पद-चिन्हों पर चलते हुए शिक्षा व राजनीति के क्षेत्र में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई हुई है।उनकी सुपुत्री डॉ. शैफाली यादव आर.सी.ए. कन्या महाविद्यालय, मैनपुरी की प्राचार्य हैं।साथ ही उनकी सुपुत्री श्रीमती सुरभि यादव व श्रीमती रूपाली यादव भी अपने पूज्य पिताश्री के द्वारा अधूरे छोड़े गए कार्यों को पूर्ण करने में कृत संकल्पित हैं।इस तरह उनका पूरा ही परिवार देश व समाज की सेवा के लिए पूर्ण निष्ठा के साथ समर्पित है।
मेरी प्रभु से प्रार्थना है कि श्री उदय प्रताप सिंह जी शतायु ही नहीं, अपितु चिरायु हों।जिससे आगामी पीढ़ियां उनके व्यक्तित्व व कृतित्व से लाभान्वित हो सकें।
“यूपी रत्न” डॉ. गोपाल चतुर्वेदी, एडवोकेट
(लेखक प्रख्यात साहित्यकार, चिंतक व पत्रकार हैं)
मोबाइल – 9412178154























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