श्रद्धांजलि-
डॉ.बचन सिंह सिकरवार
भारतीय सिनेमा जगत् में कुछ ही ऐसे अभिनेता ऐसा हैं, जिन्होंने हास्य अभिनेता के रूप में अपना विशिष्ट स्थान बनाने के बाद भी सहायक अभिनेता,चरित्र अभिनेता के साथ-साथ अपनी खल भूमिका को भी बखूबी निभाया हो, कोई 350 से अधिक हिन्दी और गुजराती फिल्मों में विभिन्न भूमिकाओं में से हास्य में विशेष पहचान बनाने वाले असरानी ऐसे ही अभिनेता/निर्देशक थे,जिनका 20अक्टूबर,सोमवार को दोपहर तीन बजे तीन सौ से अधिक फिल्मों में विभिन्न प्रकार की भूमिका निभाने वाले ‘गोवर्धन असरानी‘ का मुम्बई के उपनगर जुहू स्थित ‘भारतीरय आरोग्य निधि अस्पताल’ में 84वर्ष की अवस्था में निधन हो गया।वह उनके फेफड़ों में पानी जमा हो गया था। अपने सहज,स्वभाविक अभिनय,कॉमिक टाइमिंग,चेहरे के हाव-भाव/भावभंगिमा और संवाद बोलने के विशिष्ट ढंग/अन्दाज अपने चरित्र को जीवन्त करने की उनमें अद्भुत सामर्थ्य थी, जिसके दर्शक उनके दीवाने थे। इसके बूते वह अपने समय के प्रसिद्ध निर्देशकों की पहली पसन्द बन गए। असरानी भारतीय सिनेमा जगत् में सर्वाधिक समय तक सक्रिय रहने वाले हास्य अभिनेता थे। वैसे तो असरानी ने पाँच दशक के अपने फिल्मी जीवन में तमाम फिल्मों में चरित्र निभाते हुए बहुत से स्मरणीय, रोचक, प्रभावी संवाद बोले थे,लेकिन इनमें निर्माता/निर्देशक रमेश सिप्पी की कोई पचास साल पहले प्रदर्शित अत्यन्त चर्चित फिल्म ‘शोले’ में असरानी हिटलरकट मूँछों वाले सनकी जेलर की भूमिका निभाते हुए बोला यह लोकप्रिय संवाद ,‘‘हम अँग्रेजों के जमाने के जेलर हैं…….. आधे इधर जाओ,आधे उधर जाओ ……..बाकी मेरे पास आओ।’अविस्मरणीय बन गया। वहीं दूसरी ओर फिल्म गीतकार/निर्माता-निर्देशक गुलजार की फिल्म ‘कोशिश में असरानी अपने गूंगे बहन-बहनोई के इकलौते शिशु को उनके घर में चोरी करते हुए बरसात में जमीन पर छोड़ देता है,ताकि उसके चोरी करने के समय वे जाग नहीं जाएँ। इसका कारण वह शिशु घर के आँगन में भरे पानी में डूबकर मर जाता है। इस फिल्म के अन्त में असरानी की किसी दुर्घटना में टांग कट जाती है।वह पकड़े जाने के भय और पाप बोध में पानी में डूब कर मर जाता है। इस खलनायक/बदमाश/चोर की भूमिका को असरानी ने जीवन्त कर दिया था। इस तरह का चरित्र निभाना किसी हास्य कलाकार के लिए आसान नहीं होता। सन् 1976 में फिल्म ‘बालिका बधू ’अपने उत्कृष्ट अभिनय के लिए उन्हें ‘फिल्म फेयर अवार्ड’से मिला था। हिन्दी सिनेमा के अलावा असरानी ने गुजराती सिनेमा में भी योगदान दिया। वह न केवल बेहतरीन अभिनेता थे,बल्कि निर्देशन के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनायी। असरानी गुजराती और राजस्थानी समेत कई अलग-अलग भाषाओं की फिल्मों में अभिनय किया।
जहाँ तक असरानी के जीवन यात्रा का प्रश्न है तो हास्य अभिनेता असरानी का यह नाम भी पेशेवर है। उनका वास्तविक नाम ‘गोवर्द्धन असरानी’ था। इनका जन्म 1जनवरी,सन् 1941 राजस्थान के जयपुर में एक हिन्दू सिन्धी परिवार में हुआ,जो यहाँ सिन्ध प्रदेश से आकर बसा था। असरानी की अभिनय यात्रा नाटक/थियेटर से हुई।उन्होंने 1960 से 62 तक ललितकला भवन और ठक्कर से अभिनय का शिक्षा/ प्रशि़क्षण ग्रहण करने से हुई। तत्पश्चताप असरानी ने फिल्मों में अभिनय करने के लिए मुम्बई आ गए। यहाँ उनकी भेंट फिल्म अभिनेता-निर्माता,निर्देशक किशोर साहू और निर्माता-निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी से भेंट हुई। इन दोनों ने उनकी अभिनय प्रतिभा को पहचानते हुए इन्हें फिल्मों में अभिनय करने से पूर्व पेशेवर प्रशिक्षण लेने का सुझाव दिया। इसके बाद असरानी ‘भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान’(एफटीआइआइ)पुणे से प्रशिक्षिण लिया और कुछ समय वहाँ अध्यापन भी किया। उस दौरान इन्होंने जया भादुड़ी को भी पढ़ाया/प्रशिक्षित किया था। असरानी ने हिन्दी सिनेमा में अभिनय की शुरुआत सन् 1967में किशोर साहू के निर्देशन में बनी फिल्म ‘हरे काँच की चूड़ियाँ’ से की। इस फिल्म में असरानी अभिनेता विश्वजीत के मित्र बने थे।यह फिल्म बहुत लोकप्रिय हुई।उन्हें पहली बार फिल्म ‘आज की ताजा खबर’ में उनकी भूमिका के लिए पहचाना गया। उनकी एक और यादगार भूमिका ‘छोटी सी बात’ में महिला का ध्यान आकर्षित करने के लिए नायक के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने के वाले कलाकार की रही। यद्यपि असरानी ने गम्भीर और सहायक भूमिकाओं से शुरुआत की थी,तथापि कालान्तर में उनकी हास्य अभिनय की प्रतिभा उभर कर आयी। सन्1970से 1980 के मध्य वह हिन्दी सिनेमा का एक प्रमुख चेहरा बन गए। इस बीच अक्सर प्यारे मूर्ख,परेशान बाबू/क्लर्क या फिर हास्य/हसोड़ा/मजाकिया सहायक की भूमिकाओं का निर्वहन किया।प्रख्यात फिल्म निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी उनके गुरु और मार्गदर्शक थे। उनकी फिल्में-‘बावची‘र्, ‘अभिमान’,‘चुपके-चुपके’आदि में उन्होंने बेजोड़ अभिनय किया। असरानी ने गीतकार और निर्देशक गुलजार की कई फिल्मों जैसे ‘मेरे अपने’, कोशिश,किनारा, ‘परिचय‘ में भी स्मरणीय अभिनय किया। ‘चला मुरारी हीरो बनने’, ‘दो लड़के दोनों कड़के’ और ‘बन्दिश’, ‘रफू चक्कर’, ‘बालिका बधू’, ‘हीरालाल पन्नालाल’, ‘पति पत्नी और वह’,‘ दीवाने हुए पागल’,‘हलचल’ भी ऐसी फिल्में हैं, जिनमें असरानी ने अपनी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग से प्रंशसकों को प्रभावित किया। सन् 1975 में प्रदर्शित फिल्म ‘शोले’ में सनकी जेलर की भूमिका ने तो उन्हें एक अलग ही पहचान दी और उनकी इस भूमिका को अविस्मरणीय बना दिया। असरानी ने अपने पाँच दशक लम्बे करियर के प्रत्येक दौर में सबसे बड़े निर्देशकों और लगभग हर शीर्ष सितारे के साथ काम किया। चाहे वह राजेश खन्ना हों, अमिताभ बच्चन,आमिर खान या कोई अन्य। इनके सिवाय वर्षों बाद उन्होंने ‘भुल भुलैया’, ‘धमाल’, ‘आल द बेस्ट’,वेलकम’, ‘आर.राजकुमार’,‘बण्टी और बबली-2‘,‘ड्रीम गर्ल-2’ जैसी हिट फिल्में में अपने अभिनय का जौहर दिखाया। असरानी की आखिरी फिल्में ‘भूत बंगला’ और ‘हैवान’ हैं,जो अगले वर्ष यानी 2026 में प्रदर्शित होंगी। ये दोनों फिल्में उनके प्रंशसकों के लिए विशेष उपहार होंगी। इन दोनों फिल्मों के निर्देशक प्रियदर्शन हैं,जो साफ-सुथरी सामाजिक और हास्य फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं।वैसे भी असरानी ने उनकी अधिकतर फिल्मों में कार्य किया गया है। सि़द्धान्त कहें या कानून के अनुपालन के मामले में असरानी बहुत कठोर/सख्त थे। इस कारण प्रख्यात फिल्म अभिनेता औा निर्माता राजकपूर उनसे बेहद नाराज रहे। हुआ यह कि फिल्म’मेरा नाम जोकर’के धन कमाने में विफल होने से उन्हें भारी हानि हुई। इसकी भरपाई के लिए राजकपूर अपने बेटे ऋषि कपूर और डिम्पल कपाड़िया को लेकर युवा जोड़ी के प्रेम पर आधारित‘बॉबी’फिल्म बनाना चाहते थे,ताकि मेरा नाम जोकर फिल्म में धन हानि की भरपायी हो सके। लेकिन इस फिल्म के निर्माण पहले वह ऋषि कपूर को अभिनय कला का पेशेवर प्रशिक्षण दिलाना चाहते थे। उस देश में इसके लिए अधिक संस्थान नहीं थे। ऐसे में वे अपने बेटे ऋषि कपूर को लेकर पुणे स्थित ‘भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान गए,जहाँ तब असरानी प्रशिक्षक थे। लेकिन इसमें प्रवेश हेतु न्यूनतम शिक्षा/उपाधि अनिवार्य थी,जो ऋषि कपूर के पास नहीं थी। राजकपूर चाहते थे कि असरानी किसी तरह उनके पुत्र को संस्थान में प्रवेश दिलाने में सहयोग करें,पर ऐसा करने में असरानी ने अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी। इससे उन्हें गहरा आघात लगा। इस कारण जिन्दगी भर उन्होंने असरानी को अपनी फिल्मों में कभी कार्य करने का अवसर नहीं दिया।फिर भी उनके बेटे ऋषि कपूर से असरानी की गहरी मित्रता थी।उनके साथ असरानी ने ‘रफू चक्कर’ फिल्म में अभिनय किया। जब असरानी अपने निर्देशन में स्वयं की फिल्म ‘चला मुरारी हीरो बनने’ का निर्माण किया,तब उन्होंने ऋषि कपूर को अपनी फिल्म में खलनायक की भूमिका दी और स्वयं हीरो बने थे,जिसे ऋषि कपूर न केवल सहर्ष स्वीकार किया,बल्कि इसका कोई पारिश्रमिक भी नहीं लिया। ऐसी थी असरानी और ऋषि कपूर की दोस्ती।
असरानी के निधन पर काजोल, कंगना रनौत, अनुपम खेर, राजकुमार राव समेत अनेक कलाकारों ने उन्हें इण्टरनेट मीडिया पर श्रद्धांजलि दी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा,‘‘ गोवर्धन असरानी जी के निधन से गहरा दुःख हुआ।हमने एक प्रतिभाशाली और बहुमुखी कलाकार खो दिया।’’ फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन,‘‘ हमने एक और ………असरानी को खो दिया,जो एक अत्यन्त प्रतिभाशाली सहकर्मी थे और फिल्म संस्थान में जया(जया भदुड़ी बच्चन)के शिक्षक थे।यह अचानक और दुःखद है। ‘‘ ‘‘असरानी के निधन से दुःखी हूँ। अभिनेता अक्षय कुमार ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा,‘‘एक सप्ताह पहले ही ‘हैवान’ की शूटिंग के दौरान हमने एक -दूसरे को गले लगाया था।बहुत प्यारे इन्सान थे।उनकी कॉमिक टाइमिंग लाजवाब थी। ‘हेराफेरी’ से लेकर ‘भगम भगम’, ‘दे दना दन’, ‘वेलकम’ और अब हमारी अभी तक रिलीज नहीं हुई‘भूत बंगला’ और ‘हैवान’ तक मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा और काम किया।‘‘ प्रख्यात फिल्म निर्माता-निर्देशक रमेश सिप्पी ने कहा,‘‘असरानी के निधन पर शोक करते हुए कहा,‘‘उन्हें ‘शोले’ में तानाशाह जेलर की भूमिका निभाने के लिए हमेशा याद किय जाएगा,क्योंकि यह एक ऐसी भूमिका थी जिसके लिए वह पैदा हुए थे।’’
हिन्दी सिनेमा जगत् के इस महान कलाकार की विदाई ने इस फिल्मी दुनिया में एक खालीपन/शून्य पैदा कर दिया है,उसकी भरपायी आसान नहीं है।
सम्पर्क-डॉ.बचन सिंह सिकरवार 63ब,गाँधी नगर,आगरा-282003 मो.नम्बर-9411684054





















This Month : 12636
This Year : 118676
Add Comment