डाॅ.बचन सिंह सिकरवार
हाल में देशभर के सिनेमाघरों में प्रदर्शित फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ ने दुनिया सामने इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा कश्मीरी पण्डितों पर किये जुल्मों, उनके महिलाओं के साथ बदसलूकी/बलात्कार, उनके नरसंहार, उनके जबरन पलायन के तकलीफों, असहनीय दर्द और संघर्ष को जिस सच्चाई से उजागर किया गया है, उसे देखकर/ जानकार जहाँ देश के ज्यादातर लोग तारीफ करते हुए इस फिल्म के निर्माता और कलाकारों को शाबाशी दे रहे हैं, वहीं कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो इस फिल्म के सिनेमाघरों में प्रदर्शन से पहले और उसके बाद से बेहद दुःखी और हैरान- परेशान हंै। उन्हें यह सोचकर बेहद डर लग रहा है कि वे जम्मू-कश्मीर के इस्लामिक कट्टरपन्थियों की दरिन्दगी और हैवानियत तथा उसके पीछे यहाँ अपने ‘निजाम-ए-मुस्तफा’कायम करने के एजेण्डे हकीकत को अब तक कश्मीरियत, जम्हूरियत, इन्सानियत के जिस फर्जी चादर से ढके हुए थे, वह खुलकर दुनिया के सामने कैसे आ गयी? यही कारण है कि जहाँ स्वम्भू और स्वघोषित बुद्धिजीवियों को यह वर्ग पूरी तरह से सत्य तथ्यों पर आधारित ‘द कश्मीर राइफल्स’ को फर्जी प्रचार ( प्रोपेगेण्डा) बता रहा है, वहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के वे पैरोकार इस फिल्म के प्रदर्शन को रोकने और अब उसमें दिखाई सच्चाई को झूठा बताने मंे जुटे हंै,जो ‘नागरिकता संशोधन अधिनियम’(सीएए) और कृषि कानून विरोधी किसान आन्दोलनकारियों को महीनों सड़कें घेर कर आन्दोलन करने,जे.एन.यू.में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ ‘कश्मीर चाहे आजादी,लेके रहेंगे आजादी’,‘अफजल हम शर्मिन्दा हैं,तेरे कातिल जिन्दा’ सरीखे जहरीले, देशद्रोहपूर्ण नारे लगाने वालों की हिमायत लेते हुए उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताते नहीं थकते थे। अब जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ‘ द कश्मीर फाइल्स’ को मनगढ़न्त बताने के साथ-साथ कश्मीरी पण्डित के पलायन के समय भाजपा की सरकार होने की बात कह रहे हैं। सच्चाई यह है कि उस वक्त केन्द्र में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के जनता दल की सरकार थी,जिसे बाहर से भाजपा तथा वामदल समर्थन दे रहे थे। इस सरकार में गृहमंत्री मुपती मोहम्मद सईद थे ,जिन्होंने साजिश के तहत अपनी बेटी रुबिया सईद का अपहरण कराया। फिर उसे छुड़वाने की आड़ में कई दुर्दान्त दहशतगर्दों की रिहाई करायी।
अब उमर अब्दुल्ला और उन जैसे दूसरे सियासी तथा गैर सियासी लोग ‘द कश्मीर फाइल्स’ मनगढ़न्त सिद्ध कराने में जुटे हुए हैं, जबकि इस फिल्म का निर्माण करने वालों ने कोई सात सौ से अधिक कश्मीर पण्डितों की आपबीती सुनकर और उनके द्वारा उपलब्ध कराये प्रमाणों के आधार पर इस फिल्म की कहानी तैयार की है। वैसे भी उस पलायन के भुगतभोगी अभी जीवित हैं,उनसे ये लोग पुष्टि कर सकते हैं। इस फिल्म के जरिए कश्मीर के मुस्लिम नेताओं के असली चेहरे को भी सामने लाया गया है,जो दिल्ली में राष्ट्रवादी,जम्मू में साम्यवादी तथा कश्मीर घाटी में साम्प्रदायिक/कट्टर इस्लामिक बन जाते हैं,लेकिन पंथनिरपेक्ष समझे जाते हैं। इनकी इस हकीकत को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरू भी नहीं समझ पाए थे। यही कारण है कि वे शेख अब्दुल्ला साम्यवादी/समाजवादी विचारधारा का वतनपरस्त नेता समझते रहे, जबकि उसका शुरू से ही इरादा कश्मीरी हिन्दुओं की जमीन लेकर हममजहबियों में बाँट कर उनकी हमदर्दी हासिल करना था, ताकि अपनी हूकुमत में यहाँ दारूल इस्लाम कायम किया जा सके। उमर अब्दुल्ला की तरह ही शिवसेना भी सियासी फायदों के लिए इस फिल्म को मनगढ़न्त बता रही है। इससे यही लगता है कि हजारों साल की गुलामी के बाद भी अपने देश के लोगों ने कोई सबक नहीं लिया है, तभी तो अपने को राष्ट्रवादी/हिन्दूवादी पार्टी शिवसेना भी ‘द कश्मीर फाइल्स’ को प्रोपेगण्डा बताने में थोड़ा भी संकोच नहीं कर रही है,जबकि इस फिल्म में एक दृश्य है,जहाँ कैम्प में रह रहे कश्मीरी पण्डित गर्व से कहते हैं कि महाराष्ट्र में अपनी सरकार के दौरान बाला साहेब ठाकरे ने उनके बच्चों के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर उन्हें बड़ा सहारा दिया। धिक्कार है!इनकी ऐसी सियासत को।
वैसे भी जम्मू-कश्मीर के ज्यादातर सियासी नेता और अलगाववादी कश्मीरी पण्डितों के पलायन के लिए खुद के बजाय राज्यपाल जगमोहन को गुनाहगार ठहराते आए हैं। हकीकत यह है कि 19 जनवरी, 1990 को इस्लामिक कट्टरपंथियों को बन्दूक के जोर कश्मीरी पण्डितों को कश्मीर घाटी से बेदखल करने की मुहिम चलायी थी, उसी दिन नेशनल काॅन्फ्रेंस तथा काँग्रेस की साझा सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डाॅ.फारूक अब्दुल्ला अपने पद से इस्तीफा देकर लन्दन चले गए। कायदे से उनकी जिम्मेदारी हर हाल में इस्लामिक दरिन्दों की हिंसा से कश्मीरी पण्डितों की हिफाजत करना था, लेकिन उन्हें खुली छूट देने के मकसद से इरादे से वतन छोड़ गए। इसी दिन जगमोहन ने दुबारा राज्यपाल का पद सम्हाला। ऐसे में उनके पास इस्लामिक कट्टरपंथियों कश्मीरी हिन्दुओं और सिखों को कत्ल-ए-आम से बचाने के लिए कश्मीर घाटी से निकालने के सिवाय दूसरा विकल्प ही क्या था? वैसे 4 जनवरी,1990 को ही पाकिस्तान समर्थित इस्लामिक कट्टरपंथियों ने मस्जिदों और दीवारों पर पोस्टर चिपका कर कश्मीरी पण्डितों को अपने घर छोड़कर चले जाने का फरमान जारी कर दिया था। फिर ‘रलीब’,’गलीव’,’चलीव’(धर्म बदलो, मारो, भागो),‘अल सफा,पण्डित दफा’,‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’, ’फ्री कश्मीर’,‘कश्मीर विद आउट हिन्दू,विद हिन्दू वुमेन’नारे लग और लिखे जा रहे थे। अब जाहिर हो गया है कि डाॅ.फारूक अब्दुल्ला, उनके बेटे उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुपती जिस कश्मीरियत का नाम लेकर हिन्दू-मुसलमानों के भाईचारे की दुहाई देती आयी हैं,वह कतई फर्जी है। कश्मीरी हिन्दुओं के कत्ल-ए-आम में उनके ही शिष्य, पड़ोसी और दूसरे मिलने वाले या तो शामिल थे या फिर कातिलों के मददगार रहे थे,जो उनकी जायदाद या उनकी औरतों को हासिल करने की चाहत रखते थे। इस कत्ल-ए-आम में चुन-चुन कर कश्मीरी पण्डितों के नेताओं,न्यायाधीशों, अधिकारियों आदि को मारा गया। श्रीनगर के हाईकोर्ट के जज नीलकण्ठ गंजू की सरे आम गोली मार कर हत्या कर दी गई,जिन्होंने ‘जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रण्ट’(जेकेएलएफ)के संस्थापक दहशतगर्द मकबूल बट्ट को फाँसी की सजा सुनायी थी। उस पर बैंक लूटने के दौरान उसके प्रबन्धक की हत्या, इण्डियन एयर लाइन्स के जहाज का अपहरण कर उसे विस्फोट से उड़ाने तथा सी.आइ.डी.अधिकारी अमरचन्द को मार डालने का इल्जाम था। इस फिल्म ने कश्मीर घाटी के उन मुसलमान नेताओं को बेनकाब किया गया है,जो आजादी के बाद से ही दिल्ली में राष्ट्रवादी (नेशनलिस्टस), जम्मू में साम्यवादी (कम्यूनिस्ट) और कश्मीर घाटी साम्प्रदायिक (कम्यूलनिस्ट)होते थे, फिर भी वे कहे जाते हैं पंथ निरपेक्ष(सेक्यूलरिस्ट)।फिल्म के एक संवाद में कहा गया है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री के पास वक्त ही कहाँ है? वह तो गोल्फ खेलने तथा बम्बई से आयी हिरोइनों को घूमने में व्यस्त रहते हैं। प्रधानमंत्री का कहना है कि मुख्यमंत्री उनके दोस्त है,उनसे क्या कहें? फिल्म के मुख्य पात्र पुष्करनाथ से कहलवाया गया है कि सन् 1947के बाद से ही दिल्ली ने जम्मू-कश्मीर को भुला दिया है। जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री से यह कहलवाना भी अब्दुल्ला परिवार को खटकना स्वाभाविक है,जिसमें वह कमिशनर से कहता है- ‘‘यह कश्मीर है। हम आजाद हैं।यहाँ हमारा कन्स्टीट्यूशन हैं।हमारा कल्चर है। यहाँ के लोग जो चाहेंगे,वह करेंगे?‘।इस पर कमिनशर का यह कहना कि पाकिस्तान और यहाँ के लोग मिलकर सिविलाइजेशन का वार चल रहे हंै,जो भारत की हजारों साल पुरानी सिविलाइजेशन के खिलाफ है। इसे आपकी पार्टी के हेडक्वार्टर से मदद मिल रही है। इसके बाद वह कमिशनर को दिल्ली के लाबिंग करने और इण्डियन स्पाई होने का आरोप लगाते हुए सस्पेण्ड कर देता है। फिल्म में कश्मीरी मुस्लिम महिलाओं द्वारा हिन्दू महिलाओं से राशन छीन कर फेंकते दिखाने से स्पष्ट है कि सिर्फ मुसलमान ही जिहादी मानसिकता से ग्रस्त नहीं है, उनकी औरतें भी उनके जिहाद में बराबर की साझीदार हैं। इस फिल्म में जहाँ एक दृश्य में पेड़ों पर मारे गए हिन्दुओं की लाशों लटकी दिखाई गईं हैं, वहीं कई दृश्य में जिहादियों द्वारा सामूहिक रूप से कश्मीरी हिन्दू पुरुषों, महिलाओं,बच्चों को गोली मार कर जाने लेते दिखाया गया है। यहाँ तक एक हिन्दू महिला को नग्न कर आरा मशीन से चीर कर दो टुकड़े करना भी दर्शाया गया है। ये सच्ची घटनाएँ हैं,इनके चश्मदीद सम्बन्धी/पड़ोसी अभी तक जीवित हैं। इस फिल्म में विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं की कैम्पों में मौसमी तकलीफें उनसे पैदा बीमारियाँ ,साँप,बिच्छू के काटे जाने से होने वाली मौतें और तमाम तरह के अभाव दिखाने के साथ अपना घर छूटने की पीड़ा दर्शाया गया है। इसके बावजूद षड्यंत्र रूप से एक विश्वविद्यालय के शिक्षकों द्वारा छात्रों के बीच यह मनगढ़न्त विमर्श चलाया जा रहा है कि कश्मीर के बाशिन्दे मुसलमानों के साथ भारतीय सेना जुल्म ढहा रही है, उसकी वजह से मुस्लिम युवा बन्दूक उठाने को मजबूर हैं। कश्मीर पर भारत ने गैरकानूनी तरीके से कब्जा किया हुआ है।इसलिए उसकी आजादी के लिए जंग जरूरी है।उनके इस झूठ से युवा दिग्भ्रमित होकर अपनों को ही गुनाहगार ठहराने में लगे हैं।लेकिन फिल्म में कश्मीर के सच्चे इतिहास का वर्णन कर उन लोगों की आँखें खोल दी हैं, जो अरुन्धति राय की तरह जाने-अनजाने कश्मीर को मुसलमानों का होना समझते आए हैं।
अब जो भी हो, इस फिल्म ने जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान समर्थक इस्लामिक कट्टरपंथियों और उनके मददगार सियासी पार्टियों की कारगुजरियों को देश के लोगों को सामने ला दिया है। अब इसे फर्जी प्रचार बताने से उनके द्वारा इस हकीकत को छुपा पाना नामुमकिन है। ऐसे में उनके लिए अपनी गलतियों के लिए तौबा करना ही बेहतर होगा। फिर भी देश के लोग इनके इन संगीन गुनाहों के लिए शायद ही इन्हें माफ कर पायें?
सम्पर्क- डाॅ. बचन सिंह सिकरवार 63ब,गाँधी नगर, आगरा- 282003 मो.नम्बर-9411684054
हकीकत के खुलासे अब बुखलाहट क्यों ?





















This Month : 12656
This Year : 118696
Add Comment